शनिवार, 11 जून 2011

सबहि नचावत राम गुंसाई..... नृत्य-गान पर दो शब्द चित्र / चित्र 1- विद्रूप का उत्सव या उत्सव का विद्रूप

प्रस्तुत रचना लखनऊ के राज नारायण जी की है, जो साहित्य-कला के रसिक ही नहीं, मर्मज्ञ हैं. वे S.B.I. में हैं और यह रचना "SBI BLOG" से साभार उद्धृत है- 
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अभी 25 मई को विवाह गीतों पर आधारित लोक गीतों की एक नृत्य-संगीत संध्या मे बतौर दर्शक/श्रोता शामिल होने का अवसर मिला.उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मे (जो मेरी जन्मभूमि है, घर भी है सम्प्रति वहीं नियुक्ति निवास भी है) चिनहट से थोड़ा आगे इंदिरा नहर के किनारे एक लोक ग्राम्य कला तथा परिवेश को समाहित किये हुए एक पर परिसर है - "कलागांव." एक बड़े परिसर मे गांव को साकार किया गया है - वही कच्चे छप्पर वाले घर, तालाब , नहर, बैलगाड़ी, चौपाल, लोक/श्रम गीत, लोक/ग्राम्य कला, ग्राम्य पहनावे में कर्मचारी --- संक्षेप मे वह सब कुछ कि लगे कि हम गांव में हैं. यद्यपि सब कृत्रिम है (वातानुकूलित झोपड़ियां भी हैं) फिर भी, कर्मचारियों का व्यवहार भाषा कृत्रिम / व्यवसायिक नही है और हमारी नयी पीढ़ी के लिये तो एक कौतूहल सौगात ही है . ( जिन्हे 'कलागांव' के बारे मे अधिक उत्सुकता हो, वे कृपया www.kalagaon.com देखें )
जानकारी देने के चक्कर मे विषयान्तर हो गया. खैर, मूल विषय पर आता हूँ. विवाह एक विशद उत्सव ही है और जहां उत्सव हो वहां नाच-गाना, ढोलक की थाप, छेड़-छाड़, रूठना- मनाना, हर्ष-उल्लास , मान-अभिमान, नत होना आंखॅ नम होना तो होगा ही. अब तो लोग (विशेषतः किशोर वय तक के शहरी/महानगरीय बच्चे) तो इन सब के नाम पर बस जो सीरियलों मे होता है-- उसी को ही विवाह गीत/ रस्मों आदि के रूप मे जानते हैं, ऐसे में पुरानी/ गांव की रस्मों गीतों से युक्त एक शाम तो मनोरंजन से अधिक अपनी विरासत से मुलाकात थी.
पूरा कार्यक्रम एक विवाह की भांति था . विवाह गीतों मे रस्मों/रीति-रिवाजों को या विवाह रस्मों मे गीतों/नृत्य - संगीत को पिरोया गया था. शुरु से जब कन्या का पिता वर देखने जाता है, तभी से मां-बाप के मन मे कैसी हूक उठती है, एक तरफ तो यह तत्परता कि कन्या के लिये उपयुक्त वर मिले तो दूसरी ओर बेटी के बिछोह का दुःख- इस भाव को वही ठीक-ठीक समझ सकते हैं जो विवाह योग्य कन्या के मां-बाप हों (साथ ही साथ संस्कारी भी हों, अति आधुनिक नहीं कि यह सब महसूस भी कर सकें या थोड़ा-बहुत महसूस भी करें तो इसे कस्बाई/गंवई मानसिकता मान कर छुपाएं). खुशी और घबराहट दोनो होती है. मां-बाप का यह हाल होता है तो कन्या के मन मे मायका छूटने के दुःख के साथ भावी घर-वर के प्रति आशंका उमंग दोनो ही. कन्या के छोटे भाई-बहनों/ सहेलियों की अलग ही खुशी छेड़-छाड़. इन सबको एक सुन्दर/मार्मिक गीत नृत्य के साथ विवाह के उपयुक्त परिधानों मे सजी महिलाओं/बालिकाओं ने पेश किया. पूरा वातावरण सजीव हो उठा-- और क्यों हो ... आकाशवाणी / दूरदर्शन के कलाकार , दूरदर्शन के उदघोषक और सोने पर सुहागा यह कि श्री योगेश प्रवीन ( इनके नाम से लखनऊ के सुधी जन भली-भांति परिचित हैं , अन्य लोगों को बता दूं कि वे इतिहासविद, लेखक लोक जीवन के मर्मज्ञ हैं - उमराव जान समेत अनेक फिल्मों मे भी उनका योगदान है, लखनऊ पर उनकी कई किताबें हैं और मुझे उनके संसर्ग का सौभाग्य मिला जब मै लखनऊ के विद्यांत कॉलेज मे पढ़ता था जहां वे अध्यापक थे) की परिकल्पना आलेख से सजी संध्या "अवध की अमराई " थी.
इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए सगाई (बरीक्षा या छेदना), तिलक, बन्ना-बन्नी, हल्दी, नकटा (हँसी - मज़ाक से भरपूर छेड़-छाड़ के गीत), गारी, (प्रेमपूर्ण गालियां - जो कन्या पक्ष की महिलाएं विवाह के दूसरे दिन कलेवा/भात के समय वर पक्ष के लोगों को लक्ष्य करके, नाम ले-लेकर गाती हैं .. कभी- कभी ये गालियां फूहड़, अश्‍लील दैहिक सम्बन्धों को भदेस भाषा मे उजागर करती हुई होती हैं किन्तु कोई बुरा नही मानता.. सब मज़ा लेते हैं. ..... अब भात तो होता नही सो गारी भी नही और अब तो बहुत ही कम महिलाओं को यह आता है , जिन्हें आता है उनकी कोई सुनता नहीं- अब तो इन सबके लिये टाईम है बोध. अब तो यह सब फूहड़ गवांरपन माना जाएगा भले ही लोग टी.वी. पर "लॉफ्टर शो" मे परिवार के साथ इससे भी फूहड़/ अश्‍लील क्यों देख रहे हों) सुहाग, विदाई आदि के गीत नृत्य-अभिनय सहित पेश किये गये.
विवाह के हर अवसर पर गीत हैं जिनमे से अधिकांश के साथ नृत्य भी होता है- वह सब अपने मूल रूप मे सजीव हो उठा. बारात पर वर पक्ष को उलाहना देते हुए 'बिन बजनी पायल लाए बने ... अपनी दादी नचावत आए बने ... अपनी भाभी/चाची .... नचावत आए बने' गीत हो या ननदोई को छेडते हुए 'सरौता कहां भूल आए प्यारे ननदोईया' हो सबने समा बांध दिया. जब विदाई की बारी आई तो कन्या का भाई बाप से लिपट कर रोना "काहे को ब्याही विदेश" गीत सबकी आखें नम कर गया, और यह सब सायास अभिनय नही था... इतनी सजीव प्रस्तुति थी... माहौल ऐसा भारी हो गया था कि अभिनय कर रहे कलाकारों समेत सबकी आंखे नम हो गयीं. बड़ी यादगार सफल प्रस्तुति रही.
इस शानदार प्रस्तुति के बाद गोरखपुर के किसी (नाम याद नही) गांव से आए ठेठ गंवई लोगों द्वारा "कहरवा" (एक पिछड़ी/श्रमिक जाति- जो गांवों मे बहुधा बड़ी गरीबी का जीवन बिताती है- द्वारा रचित गाये जाने वाले लोक गीत नाच) प्रस्तुत करने की घोषणा की गई दर्शकों/श्रोताओं से अपेक्षा की गई कि वे इसका भी आनन्द उठाएंगे कलाकारों का उत्साहवर्धन करेंगे. विडम्बना यह कि इन सबकी अपेक्षा दर्शकों से ही थी, 'अवध की अमराई' कार्यक्रम के कलाकार, उद्‍घोषक, साजिन्दे वगैरह सब मंच तो छोड़ ही चुके थे-- उन्होने थोड़ी देर बैठना भी गंवारा किया तो दर्शक भी उठने लगे थे. खैर "कहरवा" शुरू हुआ. कहां तो इससे तुरन्त पहले ही प्रशिक्षित/व्यवसायिक कलाकारों द्वारा चमक-दमक से भरपूर सधा हुआ कार्यक्रम और कहां ये गांव के लोग. इनकी वेशभूषा भी अति साधारण ही थी- वही रोज पहनी जानी वाली धोती बनियान... वह भी झक सफेद नही, बस धुली बिना प्रेस की, उस पर बनियान को साफ दिखाने के चक्कर मे इतनी नील लगाई थी कि वह खराब लग रही थी. गांव अपने वास्तविक/नग्न रूप मे था लेकिन बस यहीं तक हीनता/कमी थी.... जब गाना/पारम्परिक वाद्य (हुड़ुक जोड़ी,ढप खड़ताल) शुरू हुए खुली आवाज मे गाना शुरु हुआ तो जो कला रसिक/मर्मज्ञ थे उन्हे तो भरपूर रस मिलने लगा. उन्होने "भरथरी" ( महाराज भृर्तहरि की कथा जो कतिपय कारणों से जोगी/विरक्त हो गये थे संस्कृत मे श्रंगार शतकम, नीति शतकम वैराग्य शतकम की रचना की) शुरू किया... "भिक्षा मांगे राजा भरथरी महरानी < FONT size=3>से." एक बारगी तो लोग रुके मगर तो बहुत सांगीतिक वाद्य, साज-सज्जा और भाषा/बोली भी शहरी लोगों के लिये अनजानी-अबूझ सी. उस पर तुर्रा यह कि पहले के कार्यक्रम मे तो सब स्पष्‍ट होते हुए भी दूरदर्शन के प्रशिक्षित उद्‍घोषक थे जो गीत सार बताते चल रहे थे और कहां यह लोग जिनके पास तो उद्‍घोषक था और खुद भी कथासार बताने जैसा कुछ नही कर रहे थे . या तो वे इसमे सक्षम नही थे या उपेक्षा अन्य कारणों से हीन भावना मे थे, नही तो ये वही लोग थे जो गांव मे रात भर भारी भीड़ के बीच सफल प्रस्तुति देते थे. अब तक तो रिकार्डिंग वाले भी सामान समेटने लगे थे जो अप्रत्यक्ष संकेत था कि भैय्या! तुम लोग भी समेटो! उन लोक कलाकारों- जो सचमुच के लोक कलाकार थे, लोक कला का प्रशिक्षण पाये हुए शहरी कलाकार नही- के प्रति सबकी यह उदासीनता यह सोचने पर विवश कर रही थी कि यह अभी थोड़ी देर पहले सम्पन्न हुए उत्सव का विद्रूप था या फिर इन कलाकारों के विद्रूप का उत्सव था.
इस सबके बावजूद भी उनकी लगन, उनके खुले गले से निकलती पाटदार आवाज, उनकी मस्ती, घोर जिजीविषा, उनका नृत्य -गीत-संगीत.... कुल मिलाकर सब कुछ ऐसा था जो कहीं कहीं पहले की प्रस्तुति से कमतर नही था और यही कारण था कि वे अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे और कुछ श्रोता अभी तक जमे हुए थे... किन्तु कब तक! धीरे-धीरे लोग कम होने लगे, यहां तक कि स्थिति यह आई कि मंच पर केवल कलाकार और श्रोताओं मे केवल हम दोनो अर्थात मै और मेरी पत्नी ही बचे थे (बच्चे भी ऊब कर "गांव" भ्रमण करने गये थे जो स्थान पहले श्रोताओं से भरा था, वे श्रोतागण भी चले नही गये थे अपितु गांव भ्रमण/खान-पान मे व्यस्त थे) अब तो स्थिति बड़ी असमंजस की हो गयी थी, न हमें उठते बनता था न उन्हें कार्यक्रम समाप्त करते बनता था. वे कार्यक्रम करने, संचालन व बंद करने के मंचीय रंग-ढंग से अपरिचित-से लग रहे थे . हम उनके लिहाज में और वे हमारे लिहाज में बैठे थे. मैने ही बीड़ा उठाया, जैसे ही उन्होने गीत समाप्त किया, लपक कर मैं मुख्य गायक के पास पहुंचा और प्रशंसा के साथ बधाई दी (झूठी प्रंशसा नही थी, लटके-झटके न होते हुए भी वे इसके हकदार थे) और कार्यक्रम समाप्त हुआ. यही थोड़ी देर पहले के उत्सव का विद्रूप था कि ठेठ ग्राम्य कला के विद्रूप का उत्सव या फिर दोनो ही .
तो सुधीजनों, यह थी उक्त कार्यक्रम की रिपोर्टिंग और कला के दो पहलुओं पर नज़र. एक तरफ कला/संस्कृति के साथ-साथ तौर -तरीके, पेशेवराना अन्दाज ( Profesionalism / Perfaction ) व संरक्षण सब कुछ था तो दूसरी ओर सिर्फ कला व संस्कृति थी. कलाकार गांव से बाहर लाकर सीधे पेशेवर ( Professionals ) लोगों के बीच छोड़ दिये गये थे, फिर भी उन्होने अपनी कला के साथ कोई समझौता नही किया.
-राज नारायण


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