शनिवार, 11 जून 2011

भारतीय संगीत


परमहँस योगानन्द की आत्मकथा "योगी कथामृत" (अँग्रेजी संस्करण: Autobiography of a Yogi) के 15वें प्रकरण 'फूलगोभी की चोरी' (पृष्ठ 216-220) से साभार

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संसार में संगीत-विज्ञान की सबसे पहली जानकारी सामवेद मे उपलब्ध है भारत में संगीत, चित्रकला एवं नाट्यकला को दैवी कलाएँ माना जाता है अनादि-अनंत त्रिमूर्ती ब्रह्मा, विष्णु और शिव आद्य संगीतकार थे शास्त्र-पुराणों में वर्णन है कि शिव ने अपने नटराज या विराट्-नर्तक के रूप में ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और लय की प्रक्रिया के नृत्य में लय के अनंत प्रकारों को जन्म दिया। ब्रह्मा और विष्णु करताल और मृदंग पर ताल पकड़े हुए थे।
विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को सभी तार वाद्यों की जननी वीणा को बजाते हुए दिखाया गया है। हिन्दू चित्रकला में विष्णु के एक अवतार कृष्ण को बंसी-बजैया के रूप में चित्रित किया गया है; उस बंसी पर वे माया में भटकती आत्माओं को अपने सच्चे घर को लौट आने का बुलावा देने वाली धुन बजाते रहते हैं।
राग-रागिनियाँ या सुनिश्चित स्वरक्रम हिन्दू संगीत की आधारशिलाएँ हैं। छ्ह मूल रागों की 126 शाखाएँ-उपशाखाएँ हैं। हर राग के कम-से-कम पाँच स्वर होते हैं: एक मुख्य स्वर (वादी या राजा), एक आनुषंगिक स्वर (संवादी या प्रधानमंत्री), दो या अधिक सहायक स्वर (अनुवादी या सेवक), और एक अनमेल स्वर (विवादी या शत्रु)।
छह रागों में से हर एक की दिन के विशिष्ट समय और वर्ष की विशिष्ट ऋतु के साथ प्राकृतिक अनुरूपता है और हर राग का एक अधिष्ठाता देवता है, जो उसे विशिष्ट शक्ति और प्रभाव प्रधान करता है। इस प्रकार (1) हिण्डोल राग को केवल वसन्त ऋतु ऊषाकाल में सुना जाता है, इससे सर्वव्यापक प्रेम का भाव जागता है; (2) दीपक राग को ग्रीष्म ऋतु में सान्ध्य बेला में गाया जाता है, इससे अनुकम्पा या दया का भाव जागता है; (3) मेघराग वर्षा ऋतु में मध्याह्न काल के लिए है, इससे साहस जागता है; (4) भैरव राग अगस्त, सितम्बर, अक्तूबर महीनों के प्रातः काल में गाया जाता है, इससे शान्ति उत्पन्न होती है; (5) श्री राग शरद ऋतु की गोधूली बेला में गाया जाता है, इससे विशुद्ध प्रेम का भाव मन पर छा जाता है; (6) मालकौंस राग शीत ऋतु की मध्यरात्रि में गाया जाता है; इससे वीरता का संचार होता है।
प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति और मानव के बीच ध्वनि सम्बन्धों के इन नियमों को खोज निकाला। चूँकि प्रकृति नादब्रह्म या प्रणव झंकार या ओंकारध्वनि का घनीभूत रूप है, अतः मनुष्य विशिष्ट मंत्रों के प्रयोग द्वारा सारी प्राकृतिक अभिव्यक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है। इतिहास में 16 वीं शताब्दी के बादशाह अकबर के दरबारी गायक तानसेन की उल्लेखनीय शक्तियों का वर्णन है। एक बार दिन में ही बादशाह ने उन्हें एक रात्रिकालीन राग गाने का आदेश दिया, तो तानसेन ने एक मंत्र का प्रयोग किया, जिससे महल के सारे परिसर में तत्क्षण अँधेरा छा गया।
भारतीय संगीत में स्वर सप्तक को 22 श्रुतियों में विभक्त किया गया है। स्वर के इन सूक्ष्म अन्तालों के कारण संगीत की अभिव्यक्ति में छोटे-छोटे भेद भी सम्भव हो जाते हैं, जो 12 श्रुतियों के पाश्चात्य स्वरक्रम में दुष्प्राप्य होते हैं। हिन्दू पुराणों में सप्तक के सात मूल स्वरों का एक-एक रंग तथा किसी पक्षी या पशु के प्राकृतिक स्वर के साथ सम्बन्ध बताया गया है- सा का हरे रंग और मोर के साथ, रे का लाल रंग और चातक पक्षी के साथ, का सुनहरे रंग और बकरे के साथ, का पीली छटा लिये श्वेत रंग और सारस पक्षी के साथ, का काले रंग और कोकिला के साथ, का पीले रंग और घोड़े के साथ, नी का सभी रंगों के मिश्रण और हाथी के साथ।
भारतीय संगीत में 72 थाट या आधार स्वर समूह हैं। संगीतज्ञ के लिए किसी राग को लेकर उस राग की सीमा के अन्तर्गत अपनी प्रतिभा के अनुसार संगीत निर्माण करने की अनन्त सम्भावनाएँ रहती हैं; वह उस राग के भाव के केन्द्र में रखकर उसके चारों ओर अपनी मौलिकता की सीमा तक उसे सजाता है। हिन्दू संगीतज्ञ पहले ही निर्धारित किये जा चुके स्वरों को पढ़-पढ़ कर संगीत का निर्माण नहीं करता; वह हर वादन या गायन के समय राग के ढाँचे को नये सुरों के वस्त्र पहनाता है और यह प्रायः एक ही धुन को लेकर करता है, जिसमें वह सूक्ष्म स्वरों और लय के विभिन्न प्रकारों को बार-बार प्रयुक्त कर उन्हें निखारता है।
पाश्चात्य संगीत-रचनाकारों में बाक (Bach) ने स्वल्प विविधता के साथ सैकड़ों जटिल तरीकों से सुरों की पुनरावृत्ति की सुन्दरता और उसकी शक्ति को पहचान लिया था।
संस्कृत साहित्य में 120 तालों का वर्णन है। परम्परा के अनुसार हिन्दू संगीत के प्रथम आचार्य माने जाने वाले भरत मुनि भारद्वाज के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कोकिला के गीत में ही 32 तानों का शोध किया था। ताल या लय का मूल मानव शरीर की गति पर आधारित है- चलने का दुगना समय तथा निद्रावस्था में श्वासोच्छ्वास का तिगना समय जब श्वास की लम्बाई प्रश्वास से दुगनी होती है- में निहित है।
भारतवर्ष में प्राचीनकाल से ही मानव के कण्ठस्वर को ध्वनि का सर्वांगपूर्ण साधन माना गया है। अतः हिन्दू संगीत प्रधानतः कण्ठस्वर के तीन सप्तकों में ही प्रतिबद्ध है। इसलिए हिन्दू संगीत में स्वर संगति (एक साथ उपन्न होने वाले स्वरों का परस्पर सम्बन्ध) की अपेक्षा स्वरक्रम (क्रमानुसार उत्पन्न होने वाले स्वरों का परस्पर सम्बन्ध) पर बल दिया गया है।
हिन्दू संगीत स्वानुभूतिपरक, आध्यात्मिक तथा व्यक्तिपरक कला है, जिसका लक्ष्य वाद्यवृन्द की प्रतिभा प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि परम-आत्मा के साथ अपना मेल बिठाना है। भारतवर्ष के सभी प्रख्यात गीतों की रचना भागवतों अर्थात् ईशभक्तों द्वारा की गयी है। "संगीतज्ञ" को संस्कृत में भागवतार कहते हैं, अर्थात् "जो भगवान का गुणगान करता है।"
संकीर्तन योग आध्यात्मिक साधना का एक प्रभावशाली प्रकार है, जिसमें मूल विचार और ध्वनि में तीव्र एकाग्रता तथा तन्मयता आवश्यक होती है। मानव स्वयं नादब्रह्म या ओम् ध्वनि की एक अभिव्यक्ति है, इसलिए ध्वनि उस पर तत्काल प्रबल प्रभाव डालती है। पौर्वार्त्य और पाश्चात्य, दोनों ही प्रकार का भक्तिसंगीत मनुष्य में आनन्द उत्पन्न कर देता है क्योंकि इस प्रकार का संगीत मनुष्य के मेरूदण्ड में स्थित चक्रों में से किसी चक्र में उतने समय के लिए स्पन्दनात्मक जागृति उत्पन्न कर देता है। आनन्द के उन क्षणों में उसे अपने ईश्वरीय मूल का अस्फुट-सा स्मरण हो आता है।
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(इस उद्धरण को इस चिट्ठे (ब्लॉग) में उद्धृत करने के सम्बन्ध में मैंने योगदा सत्संग सोसायटी के कोलकाता तथा राँची कार्यालयों से फोन पर बात तो कर ली है; पर लिखित में अनुमति प्राप्त करने के लिए आलस कर रहा था, इसलिए इसे उद्धृत करने में देर हो रही थी। आज मैंने उद्धृत कर ही दिया, कल लिखित अनुमति के लिए अनुमति भेज दूँगा।)

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