शनिवार, 27 नवंबर 2010

मॉरिशस से नौ कविताएँ

मॉरिशस से नौ कविताएँ-
इस शीर्षक से किसी जमाने में धर्मयुग में अभिमन्यु अनत की नौ कविताएँ छपी थीं.
मेरे पिताजी ने इन कविताओं को एक डायरी में लिख लिया था.
उसी डायरी से आज इन कविताओं को मैं आपके लिए प्रस्तुत करता हूँ:
(1)    
जाये ये दे कहकर तुमने
विभीषण को जाने दिया
आये दे कहकर तुमने
जयचन्द को आने दिया
छोड़ दे कहकर अब तुम
छुड़ाना चाह रहे हो
जकड़ी हुई अपनी गर्दन को
                  ***

(2)  
पानी की एक बूँद
खून की एक बूँद से मिलकर
अपना अस्तित्व खो बैठी 
और खून की एक बूँद
पानी की एक बूँद से मिलकर
.......................
उसे भी अपना रंग दे गयी
फिर भी पानी खून नहीं हुआ
और खून पानी हो गया।
                  *** 
     
(3)
मेरे देश के मनमोहक समुद्रतट
उस श्वेत आक्रमण को
तुमने सुपुर्द कर दिया
व्यवसाय की भाषा में
जो सैलानी हैं।
अब गंगास्नान के लिए
मेरे आँगन में
बरसात का जमा पानी है।
                  ***
      (4)
तुम भी शहर के बीच के जंगल के राजा थे
मैं दास था बन्धेज के कारण
आंड्रोक्लीज की तरह मुझे भी
तुम पर दया आयी
मैंने भी तुम्हारे पैर से काँटा निकाला
तुम वन-पशु नहीं आदमी थे
इसलिए तुम आज भी मुझे दबोचे हुए हो
                  ***

      (5)
मेरे दोस्त!
उस भाषा में मेरे लिए
शुभ की कामना मत कर
जिसकी चुभती ध्वनी मुझे
उन गुलामी के दिनों की याद दे जाती है
चाबुक की बौछारों का आदेश
निकलता था जिस भाषा में
उस भाषा को मेरी भाषा मत कह
मेरे दोस्त!
                  ***
      (6)
तू और किस स्वर्ग की बात करता है
मैं तो दो स्थलों को जानता हूँ
एक वह वटवृक्ष है जहाँ जल कर
मेरे पूर्वज स्वर्गवासी हुए
दूसरा वह स्थान जहाँ
मेरा भविष्य मरकर वास कर रहा।
                  ***
      (7)
अतीत की रिसती छत से
मेरा वर्तमान
टप-टप टपक रहा
भविष्य के पेंदीहीन पात्र में।
                  ***
      (8)
धूप की जलती सलाखों को
नंगी पीठ पर सहता हुआ
तुम्हारी सलीब को ढोए जा रहा हूँ
मेरी यात्रा को सुगम बनाने के लिए
तुमने मेरी चावल की पोटली
अपने हाथों में ले ली!
                  ***
      (9)
ईख के खेतों का मजदूर
सूखे फेफड़े पर हाथ रक्खे मर रहा
एक भी डॉक्टर पास नहीं
उधर पाँच इंजीनियर मिलकर
ईख (चीनी) के कारखाने के पुर्जे पर
चर्बी लेप रहे।
                  ***
(बाद के दिनों में मुझे अभिमन्यु अनत की कहानी/कविताओं का संग्रह, उनका एक उपन्यास (नाम याद नहीं- यह एक मछुआरे की साहसी बेटी की जीवन गाथा पर आधारित था) और उनकी आत्मकथा पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. आत्मकथा में उन्होंने ‘अनत’ की व्याख्या ‘कभी न झुकनेवाला’ के रुप में की है.)  

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