रविवार, 12 मई 2013

लज्जाविहीन, भयमुक्त और अनैतिक भारतीय राजनीति


लज्जाविहीन, भयमुक्त और अनैतिक भारतीय राजनीति

।।हरिवंश।।

बंसल-अश्वनी प्रकरण, बीमार, अनैतिक और आत्मकेंद्रित भारतीय राजनीति के प्रतीक हैं. पवन कुमार बंसल (सीबीआइ जांच व जनदबाव में हटाये गये रेल मंत्री) और अश्वनी कुमार (न्यायपालिका की टिप्पणी के बाद हटाये गये कानून मंत्री) के अपने-अपने पदों से हटने से भी कुछ नहीं होनेवाला. कांग्रेस की पुरानी पंरपरा का अंशमात्र भी जीवित होता, तो ये दोनों लोग मामलों के उजागर होने के तत्काल बाद स्वत: इस्तीफा देकर मंत्रिमंडल से बाहर आ गये होते. इन्हें बचाये रखने की हर संभव कोशिश न होती. पर भारतीय राजनीति का मौजूदा स्वरूप सड़ गया है.

बंसल-अश्वनी जैसे प्रकरण इस सड़न की दुर्गंध-बदबू हैं. पर मूल समस्या कहां है? 1977 में मशहूर पत्रिका धर्मयुग (प्रति सप्ताह लगभग सात लाख बिकनेवाली) ने पंडित रामनंदन मिश्र से कुछ विषयों पर लिखने के लिए आग्रह किया. रामनंदन जी, गांधी के प्रिय और लोहिया, जेपी, लालबहादुर शास्त्री के साथी थे. आजादी के बाद जिन कुछेक लोगों में देश भविष्य देखता था, उनमें से एक. पर आजादी के बाद वह अध्यात्म में चले गये. धर्मयुग के लिए लिखे अपने लेखों में से एक में पंडित रामनंदन मिश्र जी की एक पंक्ति थी, जिसका आशय अब तक स्मृति में है. उनका मानना था कि जमीन इतनी सड़ गयी है कि उसमें उम्दा से उम्दा या श्रेष्ठ से श्रेष्ठ बीज डालिए, कहीं कुछ उगता नहीं है. बीज भी धरती में सड़ जाता है. यही हाल है, भारतीय राजनीति का.

अच्छे से अच्छे आदमी को राजनीति में भेजिए, उसका निश्छल व साफ -सुथरा बने रहना सबसे बड़ी चुनौती है. कैसे? यह बंसल प्रकरण से समझिए. बंसल प्रकरण में रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार और बंसल के भगिना वी सिंगला गिरफ्तार हैं. सीबीआइ ने पीके बंसल के निजी सचिव राहुल भंडारी से कई बार पूछताछ की है. भंडारी 1977 बैच के पंजाब काडर के आइएएस अधिकारी हैं. सूचना यह भी है कि बंसल व उनसे जुड़े अन्य लोगों की भी पूछताछ होगी, जिसमें उनके ओएसडी, विरतुल कुमार भी हैं. वह 1993 बैच के उत्तर प्रदेश सरकार के आइपीएस अधिकारी हैं.

बंसल की बहन के दामाद भी हैं. सूचना यह भी है कि एक हजार फोन काल्स (जिनको सीबीआइ ने दो महीने में इंटरसेप्ट या टेप किया) में कई बार बंसल का नाम है. इन फोन टेपों में, कहते हैं, विस्फोटक चीजें हैं. यह भी चर्चा है कि सीबीआइ के पास टेप की गयी फोन वार्ता में कहा गया है कि रेल के आठ बडे. पद बिकाऊ हैं. रेल मंत्री के सीधे फोन से सिंगला ने कई बार महेश कुमार व अन्य लोगों से बात की है. यह महज एक हल्की झलक है कि मुल्क कैसे चल रहा है?

खबर है कि इन टेपों में इतनी विस्फोटक बातचीत है, जिन्हें जानने के बाद कांग्रेस के बडे. नेता बंसल की बलि के लिए सहमत हुए. सिंगला और रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार की रेल मंत्री पवन बंसल के घर पर कई मुलाकातें होने की खबर है. बंसल को यह भी बताना पडे.गा कि महेश कुमार जब जीएम (महाप्रबंधक, पश्‍चिम) के पद से प्रोत्रति पाकर रेलवे बोर्ड के सदस्य हो गये, तब भी उनके पास महाप्रबंधक, पश्‍चिम का अतिरिक्त प्रभार क्यों था? उल्लेखनीय है कि रेलवे बोर्ड में यह पद सबसे आमद का माना जाता है. 

इसके साथ ही यह भी खबर आयी कि पांच साल में बंसल की पत्नी और बेटों का कारोबार शून्य से 152 करोड. रुपये तक पहुंचा. मंत्री की पत्नी मधु और बेटे अमित और मनीष ने 2005 में एक कंपनी शुरू की. 2007 में इसका टर्नओवर शून्य था. फिर बंसल केंद्र में मंत्री बने. वह संसदीय कार्य मंत्री रहे, फिर जल संसाधन मंत्री, फिर वित्त राज्य मंत्री और फिर रेल मंत्री. इसी बीच उनके परिवार के कारोबार का टर्नओवर शून्य से 152 करोड. हो गया. 2008-09 में उनकी बहन के बेटे सिंगला (गिरफ्तार) ने चंडीगढ. की एक बीमार कंपनी मार्डन बेकरी का अधिग्रहण किया, जिस पर बड.ा कर्ज था. तब पवन बंसल केंद्र में वित्त राज्य मंत्री थे. कहते हैं, बंसल के प्रभाव से मदद पाकर सिंगला ने बेकरी कंपनी के प्लाट का उपयोग बदलवा दिया. अब उस जगह कॉर्मशियल कांप्लेक्स बन रहा है. बंसल परिवार की कंपनी को केनरा बैंक से साठ करोड. रुपये का लोन भी मिला. पवन बंसल ने अपने परिवार की कंपनी के आडिटर और अपने बेटे के बिजनेस पार्टनर सुनील गुप्ता को वर्ष 2007 में केनरा बैंक का डायरेक्टर बनवा दिया. तब बंसल वित्त राज्य मंत्री थे.

अब इस पूरी घटना को इस ढंग से समझिए. एक मंत्री का उदय होता है. उसके साथ उसके परिवार के लोग जुड.ते हैं. रिश्तेदार जुड.ते हैं. सरकारी पदों पर भी. वह वित्त मंत्रालय में थे, तो अपने लोगों को बैंकों में डायरेक्टर बनवाया. अपनी पत्नी-बेटों की कंपनी को लोन भी दिलाया. यानी जिस सरकारी पद पर हों, वहां पहले पूरे परिवार का, फिर सगे-संबंधियों के काम हों. इस तरह एक मंत्री जिस महत्वपूर्ण पद पर काम करता है, वहां उसका मकसद बन जाता है, अपने परिवार की कंपनी को समृद्ध बनाना. उसके मंत्रालय को उसके नाते-रिश्तेदार और सगे-संबंधी चलाते हैं. पीछे से. दिल्ली में यह सब जानते हैं. पर यह बात उजागर होती है, जब मामला सीबीआइ की पकड. में आता है. कहा जा रहा है कि महेश कुमार रेलवे बोर्ड के सदस्य हो जाने पर दस करोड. देनेवाले थे. साथ ही महाप्रबंधक पश्‍चिम (रेल) बने रहने की कीमत अलग थी. इस पद के मातहत ही रेलवे में विद्युतीकरण का बडे. पैमाने पर काम हो रहा है. इसलिए वहां फंड है. इसी कारण उन्हें दो-दो पदों पर रखा गया था.

यानी बंसल परिवार भारतीय रेल के विकास, आधुनिकीकरण की कीमत पर अपना पाकेट भर रहा था. यह सब बेधड.क हो रहा था. फोन पर खुलेआम डील हो रही थी, पर भारत सरकार सोयी थी. चंडीगढ. के लोगों का कहना है कि रेल मंत्री बंसल चंडीगढ.-दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस के नियमित यात्री थे. पहले वह खुद चंडीगढ. के लोगों के पास मामूली चंदे के लिए जाते थे, पर 2006 में वह मंत्री बने. फिर उनके परिवार के सदस्य और भगिना विजय सिंगला, बिक्रम बंसल व उनके पुत्र मनीष और अमित ही मंत्री बंसल और उद्यमियों के बीच मुलाकात कराने के माध्यम बने. इसी तरह बंसल और सिंगला परिवार का स्टील, दवा और रियल स्टेट का कारोबार भी चल निकला. यानी बंसल मंत्री बने और उनके संगे-संबंधी और परिवार व्यापारी या उद्योगपति. राजपाट और पैसे का यह रिश्ता मौजूदा राजनीति की पहचान है.

दरअसल भारतीय राजनीति को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या परिवार लिमिटेड कंपनी में बदल देने का यह परिणाम है. सुदूर दक्षिण में देखिए, करुणानिधि का भारी-भरकम दो सौ लोगों का परिवार, फिर उनका, उनके परिवार का आधिपत्य और संपत्ति. आंध्र में वाइ राजशेखर रेड्डी और उनके पुत्र जगन रेड्डी के कमाल. कहते हैं बीस हजार करोड. से अधिक के घोटाले हुए. जब तक राजशेखर रेड्डी कांग्रेस के पावरफुल नेताथे, किसी ने उन पर हाथ नहीं डाला. कर्नाटक में देवगौड.ा और उनके सुपुत्र के प्रकरण भी जगजाहिर हैं. महाराष्ट्र में पक्ष-विपक्ष में कई दिग्गजों के परिवार, राजनीति की निर्णायक भूमिका में हैं. अपार दौलत-संपत्ति के मालिक भी. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने सगे-संबंधियों और मातहतों को भी पत्थर के खान आवंटित कर दिये हैं. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के एक दर्जन से अधिक परिवार के लोग सत्ता की कमान संभाल रहे हैं. लखनऊ से दिल्ली तक. अब देश की सत्ता पाने की होड. में हैं. प्रकाश सिंह बादल का पंजाब में और हरियाणा में चाहे कांग्रेस हो या विपक्षी, कुनबों का राज है. बिहार में कई बडे. नेताओं द्वारा राजनीति को अपने परिवार की विरासत बना लेने की कोशिश सामने है. मायावती के भाइयों की संपत्ति की चर्चा बरसों से है. ममता बनर्जी के सगे-संबंधियों के भी नाम उछलते हैं, यह सब क्या है? क्या देश या भारत सरकार प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है? रेल मंत्रालय क्या बंसल के बेटे, भगिना, बहन, दामाद वगैरह की संपत्ति थी? दरअसल मूल बीमारी है, राजनीति या सरकार या पार्टी को परिवारवाद में बदलना. लोहिया ने जब नेहरू परिवार की आलोचना की, तब सभी समाजवादी सहमत थे. आज लोहिया के चेले देश भर में अपने वंश को ही दल या सरकार में बदल रहे हैं. क्या इस मामूली बीमारी के खिलाफ कहीं आवाज है? अगर नहीं, तो बंसल की जगह कोई और आयेगा. कौन-सा कानून यह इजाजत देता है कि सरकारी पद पर आते हैं, तो आप अपने सगे-संबंधियों को वहां एकत्र कर लें. उस मंत्रालय को अपनी निजी कंपनी में तब्दील कर लें? 

सच तो यह है कि यह सब राजनीति के अनैतिक होते जाने का परिणाम है. इस राजनीति में किसी कीमत पर सत्ता चाहिए. जनता भी इसमें हिस्सेदार व समान दोषी-अपराधी है. वीरभद्र सिंह, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे होते हैं, पर हिमाचल में उनकी जीत होती है. येदुरप्पा, भ्रष्टाचार के घोषित प्रतीक माने जाते हैं, पर उन्हें बडे. पैमाने पर वोट मिलते हैं. वह अगर भाजपा के साथ होते, तो भाजपा और तीस से अधिक सीटें जीती होती. बेल्लारी खान के लुटेरे लोगों की पार्टी पीएसआर अगर बेल्लारी इलाके में नहीं लड.ी होती, तो भाजपा को वहां से और पांच अधिक सीटें मिलीं होतीं. ऐसी स्थिति में कर्नाटक विधानसभा में किसी को साफ बहुमत नहीं मिलता. भाजपा को लगभग 75 सीटें मिलती और कांग्रेस को 80. तब जनता दल (एस) या निर्दलीय सरकार बनाने की भूमिका में होते. येदियुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी, अपनी 32 सीटें सिर्फ दो हजार वोटों के अंतर से हारी. हालांकि उसे कुल छह सीटों पर कामयाबी मिली. यह निष्कर्ष है, जाने-माने चुनाव विेषकों का. भ्रष्टों को जनता का मुक्त सर्मथन! फिर ईमानदार सरकार या व्यवस्था कैसे मिलेगी? बेईमानी और ईमानदारी साथ-साथ कैसे होंगे? क्यों जनता भी भ्रष्टों के साथ खड.ी दिखती है? राजनीति में ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि आज समाज, देश या राजनीति में पैसा ही सबसे बड.ा धर्म है. कोई यह भ्रम न पाले कि एनडीए सत्ता में आ गया, तो कोई बड.ा चमत्कार होगा. वहां कोई दूसरे बंसल और अश्‍वनी कुमार होंगे. कहां से और कैसे बडे. और छोटे राजनीतिक दलों के पास हजारों करोड. चंदे के रूप में आ रहे हैं? इन सबके मूल में है कि राजनीति या सार्वजनिक जीवन में मूल्य-आदर्श खत्म हो गये हैं. नीति-अनीति का कोई अर्थ नहीं है. मूल्य या साधन-साध्य की बात दफन हो चुके हैं. क्या ऐसे समाज या माहौल में लालबहादुर शास्त्री या सरदार पटेल पैदा होंगे? प्रसंग 1827 का है. मशहूर शायर मिर्जा असदुल्ला खान गालिब दिल्ली से कोलकाता रवाना हुए. छह माह बाद वह बनारस पहुंचे. वहां उन्होंने चिराग-ए-दैर नाम से शायरी लिखी. रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक (भारत, गांधी के बाद) में इसे कालजयी कहते हैं:

मैंने एक रात एक पहुंचे हुए संत से पूछा
(जो इस कालचक्र का रहस्य जानता था)
बाबा, तुम जानते हो कि अच्छाई और विश्‍वास,
नैतिकता और प्रेम, इस अभागे देश से पलायन कर चुके हैं,
बाप और बेटे एक दूसरे का गला काटने पर उतारू हैं,
भाई और भाई लड. रहे हैं,
एकता और संघ की भावना खत्म हो गयी है,
इन अशुभ संकेतों के बावजूद अभी तक कयामत का दिन क्यों नहीं आया?
अंतिम घड.ी की विजय ध्वनि क्यों नहीं सुनायी देती?
अंतिम विनाश का सूत्र किसके हाथों में है..?

गालिब की यह पीड.ा मुगल साम्राज्य के पतन के दिनों में व्यक्त हुई. बंसल और अश्‍वनी कुमार प्रकरण भारत के पतोन्मुख दिनों की राजनीति के याद किये जानेवाले प्रसंग रहेंगे. कानून बाद में हैं. पहला तकाजा है कि लोग देखें, जानें और यकीन करें कि उनके ऊपर शासन करनेवाले लोगों का चरित्र कैसा है? कानून का सही राज है या नहीं? महाभारत ने कहा कि समाज के अगुआ लोग जिस रास्ते चलते हैं, समाज उसी रास्ते चलता है (महाजनो येन गत:, स पंथ:). इसी कांग्रेस के महान नेताओं ने सार्वजनिक जीवन के कुछ आचरण और सूत्र तय किये थे. बिना बोले. अपने जीवन, चरित्र और व्यवहार में उतार कर. अब इसी मुल्क में, इसी कांग्रेस के नेतृत्व में सार्वजनिक जीवन के पतन का नया अध्याय लिखा जा रहा है. यूपीए के पहले दौर में केंद्र में पहली बार चार्जशीटेड लोग केंद्रीय मंत्री बने. इसके पहले केंद्र में चार्जशीटेड लोगों को मंत्री बनने की परंपरा नहीं थी. यूपीए फेज-टू ने तो नैतिक मापदंडों की हर संभावित सीमा को तोड. दिया है.

बात पंडित नेहरू से शुरू करें. पंडित जी का घर उनकी पुत्री इंदिरा जी संभालती थीं. उन्हें दो पुत्र थे. इंदिरा जी की कोई अपनी आय नहीं थी. उनके बेटों को पंडित जी पढ.ाते थे. राजीव गांधी, पढ.ने इंग्लैंड गये. वहीं से उन्होंने कुछ और आर्थिक मदद मांगी. पंडित जी ने जवाब दिया, तुम्हारी वित्तीय परेशानी जान कर पीड.ा हुई. मेरा विश्‍वास करो, मैं जो तुम्हें भेज पा रहा हूं, वही मैं अपने वेतन से अफोर्ड (वहन) कर सकता हूं. मेरी पुस्तकों की रॉयल्टी भी अब बहुत कम मिलती है. लगता है, अब कम लोग मुझे पढ.ते हैं. तुमक्यों नहीं खाली समय में कोई काम करते हो. दूसरे देश से जानेवाले अधिसंख्य विद्यार्थी वहां काम करते हैं. इस तरह तुम्हें भी शांति रहेगी और मुझे भी शांति मिलेगी. इसके बाद राजीव गांधी ने ब्रिटेन में मामूली काम कर अपना जीवन चलाया. यह चरित्र था, देश के नेताओं का.

सरदार वल्लभ भाई के पुत्र डायहा भाई पटेल ने गुजरात से एक मामूली अखबार निकाला. उसमें कुछ विज्ञापन आये. सरदार पटेल को पता चला. वह अखबार तत्काल बंद हुआ. अखबारों में सूचना दी गयी कि सरदार और उनके पुत्र में कोई संबंध नहीं है. वह अखबार तो बंद हुआ ही, पर सरदार की मृत्यु तक पुत्र से संबंध टूट गया.

इसी कांग्रेस के एक महान नेता रफी अहमद किदवई होते थे. पेशे से वकील पर कभी वकालत नहीं की. बाराबंकी के रहनेवाले थे. भारत के आजाद होने से मरने तक वह केंद्र में मंत्री रहे. उनकी पत्नी थी और बो. किदवई साहब के न रहने पर उनकी पत्नी और बो बाराबंकी के उस टूटे घर में वापस लौट गये, जहां दिन में सूरज की रोशनी और रात में चंद्रमा की किरणें कमरे को रौशन करतीथीं. यानी घर का छज्जा टूटा था. रफी साहब के संयुक्त परिवार के साथ उनका परिवार रहा.

इसी तरह कैलासनाथ काटजू का प्रसंग है. वह आजादी के लड.ाई के बडे. कांग्रेसी नेता थे. उनके बेटे विश्‍वनाथ काटजू को ब्रिटेन की लाल इमली कंपनी में निदेशक बनने का प्रस्ताव मिला. तब कैलासनाथ काटजू बंगाल के गवर्नर थे. उन्होंने अपने बेटे को पत्र लिखा, वह ऐतिहासिक दस्तावेज है. पत्र में लिखा, मुझे मालूम है, मेरे पद के कारण तुम्हें यह प्रस्ताव नहीं मिल रहा है. न मैं जिस राज्य में राज्यपाल हूं, तुम्हें वहां यह पद मिल रहा है. एक पिता के रूप में तुम्हें पद का प्रस्ताव देख मुझे गौरव भी हुआ. पर जिस दिन तुम यह पद स्वीकार करोगे, मुझे सूचना दे देना, मैं गवर्नर पद से इस्तीफा दे दूंगा.

राजनीतिक जीवन में यह उा मापदंड इसी कांग्रेस ने स्थापित किया. कामराज, लालबहादुर शास्त्री.. अनेक नाम हैं, जिन्होंने अपने आचरण से राजनीति का स्तर ऊपर किया. देश की रहनुमाई करने के लिए अगुआ नेताओं को कुरबानी करनी ही पड.ती है. पर लगातार सत्ता में बने रहने के लोभ और लालच में अस्सी के दशक के बाद कांग्रेस ने ही पतन का नया अध्याय लिखना शुरू किया. क्या बंसल और अश्‍विनी कुमार के मामलों में कहीं कोई बहस या डिफेंड करने का नैतिक आधार था? कानूनी दावं-पेच अलग हैं. कानून से भी मूल्यवान हैं, विचार और मूल्य. यही देश की नियति तय करते हैं. आज हम जहां खडे. हैं, वहां देख कर लगता है कि यह मुल्क कितने दिनों तक एक रह पायेगा या यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाएं कितने दिनों तक चल पायेंगी?

मशहूर राजनीति विज्ञानी राबर्ट डल ने लिखा है कि हिंदुस्तान की स्थिति को देखते हुए यह कहना बिल्कुल अंसभव लगता है कि यह देश लोकतांत्रिक संस्थाओं को आगे बढ.ा पायेगा. यहां किसी तरह की अनुकूल परिस्थितियां नहीं हैं. देवेश कपूर, एक दूसरे अमेरिकी विद्वान ने भी लिखा, यूं तो भारत, समाज विज्ञान से संबंधित अवधारणाओं को तोड.ने के लिए मशहूर रहा है, लेकिन इस लेख के तथ्य इस शक की ओर इशारा करते हैं कि भारत में लोकतंत्र संभव हो पायेगा या नहीं? (सौजन्य - भारत, गांधी के बाद, रामचंद्र गुहा, अनुवाद सुशांत झा)

विद्वानों के ये मत दशकों पहले आये, पर आज क्या हालात हैं? संसद नहीं चलती. सीबीआइ की मूल जांच रिपोर्ट की आत्मा सरकार में बैठे लोग बदल देते हैं. मंत्रालयों के पद बिकते हैं. कारपोरेट हाउस, मंत्रियों के विभाग बदलवा देते हैं. याद रखिए अत्रा हजारे की एक मुख्य मांग थी, सीबीआइ को स्वायत्त बनाने की. पर ऐसे प्रसंग पर सरकार चर्चा या विचार करने को तैयार नहीं. माना जा रहा है कि मौजूदा लोकसभा, कामकाज की दृष्टि से अब तक की सभी पुरानी लोकसभाओं से सबसे पीछे या कमतर या खराब है. सैकड.ों बिल पडे. हैं. पर देश के विकास या चौपट होते गवर्नेंस या राजनीतिक जीवन में ऊंचाई पाने से जुडे. सवालों पर संसद या राजनीति में कहीं आहट नहीं. इस देश का दर्शन हो गया है, नेता लूटे, अफसर लूटे, जनता लूटे, जो जहां है, वहीं लूटे. अपवाद नेता, मुख्यमंत्री या मंत्री भी हैं, पर वे आज की मुख्य राजनीतिक धारा या संस्कृति के प्रेरक नहीं हैं. बाजार व भोग की आग, जिस तेजी से भारत के कोने-कोने में धधक रही है, उसमें मूल्य, संस्कार, साधन-साध्य के प्रसंग, देश-समाज की चिंता, सब दफन हो चुके हैं.

क्या अंग्रेज शासकों ने भारत के भविष्य की आहट पा ली थी? 1888 की बात है. भारत में ब्रिटिश राज को मजबूत बनाने में सर जान स्ट्रेची की महत्वपूर्ण भूमिका रही. वह गवर्नर जनरल काउंसिल के सदस्य भी थे. सेवानवृत्ति के बाद वह इंग्लैंड लौटे. कैंब्रिज में कई व्याख्यान दिये, जो बाद में इंडिया नाम की पुस्तक में छपा. उसमें स्ट्रेची का अनुमान था कि भारतीय राष्ट्र नाम की कोई चीज नहीं है, न ही भविष्य में उसके ऐसा होने की संभावना है.

भारत में चालीस साल बिताने के बाद एक क्रिकेटर और बगान मालिक ने कहा, अगर हमने कभी भारतीयों को उनका शासन चलाने की छूट प्रदान की, तो यहां अराजकता छा जायेगी. याखुदा.. किस तरह की भ्रम, अव्यवस्था, उलझन और बुरी स्थिति यहां छा जायेगी. उन्होंने यह भी कहा, भारतीयों को अपने ऊपर छोड. दिया जाये, तो शासन या राजनय के मामले में वे अभी भी बहुत बचकाने किस्म के लोग हैं. उनके तथाकथित नेता घटिया किस्म के लोग हैं.

चर्चिल ने माना था कि भारत के लोग स्वशासन के अयोग्य हैं. चर्चिल ने भविष्यवाणी की, अगर ब्रिटिश भारत से चले जायें, तो उनके द्वारा निर्मित न्यायपालिका, स्वास्थ्य सेवाएं, रेलवे और लोक निर्माण की संस्थाओं का पूरा तंत्र खत्म हो जायेगा और हिंदुस्तान बहुत तेजी से शताब्दियों पहले की बर्बरता और मध्ययुगीन लूट-खसोट के दौर में वापस चला जायेगा (संदर्भ- भारत, गांधी के बाद, रामचंद्र गुहा, अनुवाद सुशांत झा).

आज रेलवे में वैसे ही पद बिक रहे हैं, जैसे पहले अधिक बोली पर जमींदारी या जागीरदारी बिकती थी. अंग्रेजों के जमाने में भी इस देश में रेल लाइनों का जाल बिछा. हम आजाद भारत में उसमें बहुत कम जोड. पाये हैं. चीन और भारत की रेल व्यवस्था, 1950 में लगभग समान थी. आज चीन की रेल व्यवस्था दुनिया में सर्वश्रेष्ठ कही जा रही है, क्योंकि वहां न बंसल हैं, न पद बिकते हैं.

पिछले 25-30 वर्षों में एक-एक कर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण हो रहा है. विधायिका की गरिमा पर सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक दल, लोकतांत्रिक नहीं रह गये. परिवार की कंपनी (कुछेक अपवाद छोड. कर) बन गये हैं. राजनीति में चरित्र और मूल्य की कोई जगह नहीं बची. रोज कानून बनते हैं, पर कानून बनानेवाले तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर तोड.ते हैं.

बीके नेहरू (अव्वल दरजे के नौकरशाह) ने एक बार कहा था कि पुराने दिनों में कम कानून थे, पर हर कानून का पालन ईमानदार तरीके से होता था. अतिसावधानी से. आज बहुत सारे कानून हैं. पर किसी का पालन नहीं होता. कई कानूनों का इस्तेमाल चुनिंदा तौर पर होता है. पंजाब के सबसे सफल गवर्नर (अंग्रेजी राज में) सर हेनरी लाटेंस का लगातार दवाब रहता था कि जिले के अधिकारी घोडे. पर सवार होकर गांव-गांव और पूरे जिले की निगरानी करें. कामकाज देखें. प्रशासन संभालें. सिर्फ वातानुकूलित, सुंदर दफ्तरों में बैठ कर अपने वरिष्ठ और राजनीतिक आकाओं को खुश करने में समय न गंवायें.

1859 की एक और घटना है. पटना के जिला जज, पटना सिटी के एक व्यापारी के मामले की सुनवाई कर रहे थे. उन पर आरोप था कि उन्होंने 1857 के विद्रोही सिपाहियों को बडे. पैमाने पर आर्थिक मदद की थी. पटना प्रभाग के तत्कालीन कमिश्नर ने उस जज को पत्र लिखा कि उस व्यवसायी को अधिकतम सजा दें. पटना के उस जज ने बंगाल के गर्वनर को वह पत्र भेजा, यह शिकायत करते हुए कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता में यह दखल है. गवर्नर ने तत्काल कमिश्नर को डिसमिस किया. आज सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्य के आधार पर यह कहा है कि कोयला आवंटन से संबंधित जांच मामले की मूल रिपोर्ट की आत्मा ही बदल दी गयी है. इससे पूरी जांच की दशा-दिशा बदल गयी है. और यह काम केंद्र सरकार के नेतृत्व में हो रहा है, जिस पर दायित्व है, संस्थाओं की स्वायत्तता की रक्षा का. कुतकरें की आड. में या कानूनी दावं-पेच में वह कांग्रेस अपने मंत्रियों का बचाव कर रही है, जो महात्मा गांधी को भी अपना नेता कहती है.

याद करिए, 1922 में महात्मा गांधी देशद्रोह के आरोप में पकडे. गये. उन्हें जमानत पर बाहर जाने की अनुमति मिली, पर उन्होंने अस्वीकार किया. न ही कोई वकील रखा. सिर्फ एक बयान दिया. वह ऐतिहासिक बयान है. कहा, मैं कानूनी बारीकियों और तकनीकी दावं-पेच में शरण नहीं लेना चाहता. उन्होंने सरकारी आरोप को सच माना. इस नैतिक राजनीति के गर्भ से गुलाम भारत आजाद बना. आज कहीं बचाव की कोई जगह नहीं होने पर भी बंसल और अश्‍वनी कुमार के पक्ष में तर्क ढूंढे. गये. अत्यधिक लोक दबाव और टेप की विस्फोटक बातों से इन्हें हटाने की पृष्ठभूमि बनी. यह राजनीति आजाद देश को टूट और गुलामी की ओर ले जायेगी. हमारे अटार्नी जनरल, सोलिसिटर जनरल और एडिशनल अटार्नी जनरल की भूमिकाएं देखे लें. 

बोफोर्स मामले में, 2जी स्कै म में और मौजूदा कोयला खदान आवंटन प्रसंग में. इस व्यवस्था में इन्हीं लोगों पर संविधान और कानून की र्मयादा बचाये रखने का सबसे बड.ा दायित्व है, पर इनमें से कुछेक की भूमिका स्तब्ध करनेवाली है.

याद करिए, बोफोर्स मामले में 6.12.1990 को दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई हो रही थी. सीबीआइ द्वारा दायर एफआइआर निरस्त करने के संबंध में, तब सीबीआइ की ओर से एडिशनल सोलिसिटर जनरल बहस कर रहे थे. तब के माधवन (संयुक्त निदेशक सीबीआइ) ने कहा कि इस मामले में दो घंटे तक आत्मघाती और खुद को खत्म करनेवाले तर्क अदालत में दिये गये और एफआइआर में लिखे गये सभी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक शब्द जानबूझ कर छोड. दिये गये. के माधवन कोर्ट में बोल पडे.. पर उलटे उनके जैसे कर्तव्यनिष्ठ अफसर के खिलाफ कार्रवाई की बात शुरू हुई और बोफोर्स मामला पीछे छूट गया. दुर्भाग्य से माधवन जैसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की जगह धीरे-धीरे खत्म होने लगी है. याद रखिए, 1992 में माधवन की टीम ने ही हर्षद मेहता को शेयर घोटाले में गिरफ्तार किया था. सरकारी पदों पर बैठे लोगों को हवाला रूट से पैसे देने के संकेत मिले, पर सीबीआइ को इसकी जांच की अनुमति नहीं मिली. निराशा और आक्रोश से भरे के माधवन ने जुलाई 1992 में इस्तीफा दे दिया. उनकी नौकरी के कई वर्ष बाकी थे. तब भारत के वित्त मंत्री थे, मनमोहन सिंह, जिन्होंने इस शेयर घोटाले को ‘सिस्टमेटिक फेल्योर’ (व्यवस्था की विफलता) कह कर खारिज कर दिया.

2जी मामले में क्या हुआ? अक्तूबर 2010 की बात है, गोपाल सुब्रह्मण्यम (सोलिसिटर जनरल) थे, उन्होंने सीबीआइ के दो अफसरों को इस मामले पर बातचीत के लिए बुलाया. डीआइजी सुरेश कुमार पलसानिया और विवेक प्रियदश्री जांच अधिकारी थे. जो खबरें आयीं, उनके आधार पर ये दोनों वहां एक चौथे व्यक्ति को देख कर स्तब्ध रह गये. वह थीं, अनीता शेनाय. ए राजा (विवादित संचार मंत्री) की वकील. एक बात यह भी आयी कि शेनाय वहां किसी दूसरे मामले में आयी थीं. पर एसके पलसानिया और विवेक प्रियदश्री वहां से निकल गये. वाकआउट कर. इन लोगों को आपत्ति थी कि दोषी व्यक्ति के वकील की मौजूदगी में हम कैसे इस मुद्दे पर बात कर सकते हैं? इसकी शिकायत तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली तक पहुंची. वह इस बात से सहमत हुए कि इस मामले में गोपाल सुब्रह्मण्यम की जगह कोई दूसरा वकील सीबीआइ का प्रतिनिधित्व करे. तब सीबीआइ ने के वेणुगोपाल को अपना प्रप्रतिनिधित्व करने का अनुरोध किया. इस मामले का दुखद प्रसंग यह है कि ईमानदार अफसर एसके पलसानिया को बाद में ब्लड कैंसर हुआ और 44 वर्ष की उम्र (नवंबर 2012) में ही वह चले गये. वीरप्पा मोइली जिन्होंने कानून मंत्री के रूप में सीबीआइ के प्रस्ताव को सही माना था, उन्हें बदल कर कम महत्व के मंत्रालय कारपोरेट अफेयर्स का मंत्री बना दिया गया.

के माधवन, एसके पलसानिया के प्रसंग कई बार निजी तौर पर यह एहसास कराते हैं कि शायद हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जब ईश्‍वर भी न्याय और अच्छे लोगों के साथ खड.ा नहीं रहता. पर शायद जीवन यही है. विपरीत परिस्थितियों में भी जो मूल्यों और अंतरात्मा के साथ खडे. हैं, वैसे के माधवन और एसके पलसानिया जैसे लोग ही भविष्य के बेहतर समाज के मार्गदर्शक होंगे.

1990 के बोफोर्स बहस से लेकर 2जी स्कैम में एडिशनल सोलिसिटर जनरल और अटार्नी जनरल गुलाम एसाजी वाहनवती (कोलगेट मामले में) की जो भूमिका रही, उसमें कहां रोशनी है? जब इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठे लोग मौन हो जायें या सच के साथ न खडे. हों या गलत तथ्य बतायें, तब रास्ता क्या है? जिस समाज में अत्यंत बडे. पदों पर आसीन लोगों के विचार और मूल्य ऐसे हो जायें, और शासित जनता भी खामोश, मूकदर्शक या आलसी रहे, तो क्या होगा? 

भारतीय राजनीति में ये अंधकार के दिन हैं. अब तक शायद किसी केंद्रीय सरकार के इतने मंत्रियों को भ्रष्टाचार के बडे.-बडे. आरोपों में घिरने पर शर्मनाक तरीके से पद नहीं छोड.ना पड.ा था. यह राष्ट्रीय शर्म की घड.ी है. लोहिया ने कहा था, निराश रहना और काम करना ही रास्ता है. के माधवन, डीआइजी एसके पलसानिया और विवेक प्रियदश्री जैसे अफसरों की तरह ही हम समाज में जहां जिस भूमिका में हैं, खडे. रहें. यही युगधर्म है. आज की जरूरत भी. आस्कर हैमरस्टीन की कविता है, ‘यू शैल नेवर वाक एलोन’ (आशय है, आप यात्रा में अकेले नहीं होंगे)

जब आप आंधी और तूफान के बीच से गुजरते हैं,
तब आप सिर ऊंचा रखें और अंधेरे से न डरें,
तूफान के खत्म होने या अंत के बाद,
सुनहरा आकाश है और बगेरी पक्षी की सुनहरी और मधुर आवाज.
तूफानी हवाओं के बीच चलें, घोर बारिश में चलें,
तब भी चलें, जब हमारे सपने तितर-बितर हो जायें
तब भी चलें, चलते रहें, दिल में इस उम्मीद के साथ,
कि हम कभी अकेले नहीं रहेंगे,
हम यात्रा में अकेले नहीं होंगे, 
जब आप तूफानों से जूझते हुए आगे बढे.ं,
तब आप अपना सिर ऊंचा रखें और अंधेरे से न डरें.. 
(अंग्रेजी का भावानुवाद)

इस अंधेरे में जब कहीं कोई सुननेवाला न हो, तब भी आप अपनी अंतरात्मा को सुनें और ऐसी कविताओं से ऊर्जा पायें, यही रास्ता है.
**** 
(साभार: 'प्रभात खबर', 12 मई 2013) 

बुधवार, 8 मई 2013

"गीतांजली" से-


  
       कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्मदिन ईस्वी सम्वत् के हिसाब से 7 मई को और बँगला सम्वत् के हिसाब से 25 बैशाख को मनाया जाता है। परसों 7 मई था और आज "25शे बैशाख" (बंगाब्द 1420) है। इस अवसर मैं कविगुरू को सादर नमन करता हूँ और "गीतांजली" से 2 कवितायें उद्धृत करता हूँ। ये अनुवाद सत्यकाम विद्यालंकार द्वारा किये गये हैं और यह संग्रह 'राजपाल' वालों द्वारा प्रकाशित है। अनुवाद में मैंने अपनी तरफ से दो-एक मामूली बदलाव भी किये हैं।  
       देवालय
      (भजन, पूजन, साधन, आराधना)
      ---------------------------------
       पुजारी! भजन, पूजन, साधन, आराधना, इन सबको किनारे रख दे।
       द्वार बन्द करके देवालय के कोने में बैठा है?
       अपने मन के अन्धकार में छिपा बैठा, तू कौन-सी पूजा में मग्न है?
       आँखें खोलकर जरा देख तो सही, तेरा देवता तेरे देवालय में नहीं है!
       जहाँ कठोर जमीन को नरम करके किसान खेती कर रहे हैं,
       जहाँ मजदूर पत्थर तोड़कर रास्ता तैयार कर रहे हैं,
       तेरा देवता वहीं चला गया है!
      
       वे धूप-बरसात में सदा एक-समान तपते-झुलसते हैं,
       उनके दोनों हाथ मिट्टी में सने हैं,
       उनके पास जाना है तो सुन्दर परिधान त्याग कर मिट्टी-भरे रास्ते से जा!
       तेरा देवता देवालय में नहीं है,
भजन, पूजन, साधन को किनारे रख दे!
       ***
       कृपण
      -----
मैं उस समय गाँव के द्वार-द्वार पर भिक्षा माँग रहा था
जब तेरा स्वर्ण रथ दूरी पर दिखायी दिया,
मैंने मानो कोई सुन्दर सपना-सा देखा हो।
मेरे विस्मय की सीमा न थी कि यह राजाओं का राजा कौन है, जो इधर आ रहा है?

मेरी आशाओं ने सिर उठाया, सोचा, शायद मेरे दुर्भाग्य की घड़ियाँ समाप्त हो गयीं।
मैं वहीं खड़ा हो गया और सोचने लगा-
कब रथ की धूल में स्वर्ण-मुहरें गिरेंगी और राजा के हाथ भिखारियों की झोलियाँ भरने को उठेंगे!

वह रथ अचानक वहीं ठहरा, जहाँ मैं खड़ा था।
तेरे नेत्र मुझसे मिले, तू मुस्कुराता हुआ रथ से नीचे उतरा।
मैंने सोचा, मेरा भाग्य-सूर्य अब उदय होने ही वाला है।
तब अचानक तूने मेरे पास आकर अपना दक्षिण हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया
और कहा- 'मुझे देने को तू जो लाया है, दे दे।'

कितना विचित्र उपहास था।
एक राजा ने भिखारी के सामने भिक्षा के लिए हाथ फैलाया था।
मैं कुछ देर विस्मय-मुग्ध खड़ा देखता रहा।
फिर अपनी झोली से चावल की सबसे छोटी कनी निकालकर तेरे हाथ में रख दी।

किंतु मेरे आश्चर्य की सीमा न रही
जब दिन ढलने पर मैंने अपनी झोली खाली की
और देखा कि मेरी झोली में पड़े चावल की कनियों में से एक कनी सोने की भी थी!
मैं रोने लगा, बहुत रोने लगा।
जो कुछ मेरी झोली में था,
वह सब तुझे क्यों न दे डाला!
*** 
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प्रश्न उठता है कि हमारा राष्ट्रगान "जन-गण-मन" क्या वाकई जॉर्ज पंचम का "प्रशस्ती गीत" है? 
अगर हाँ, तो इसके प्रति या इसके रचयिता रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रति हमारे मन में श्रद्धा क्योंकर उत्पन्न हो? 
इन प्रश्नों के उत्तर में जो कुछ मेरे मन में आया, उसे मैंने अपने ब्लॉग 'देश-दुनिया' में यहाँ लिखा है:- 

"जन-गण-मन" को "राष्ट्रधुन" होना चाहिए, न कि "राष्ट्रगान"

रविवार, 5 मई 2013

शाहबाग पर हमारी खामोशी


* लेखक: किशोर झा *
सन् 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अत्रा आंदोलन में उमडे. हजारों लोगों की तसवीरें आज भी जेहन में ताजा हैं. उन तसवीरों को टीवी और अखबारों में इतनी बार देखा था कि चाहे तो भी नहीं भुला सकते. लोग अपने-अपने घरों से निकल कर अत्रा के सर्मथन में इकट्ठे हो रहे थे और गली-मोहल्लों में भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगा रहे थे. इंडिया गेट से अखबारों और न्यूज चैनलों तक पहुंचते-पहुंचते सैकड़ों सर्मथकों की ये तादाद हजारों और हजारों की संख्या लाखों में पहुंच जाती थी. तमाम समाचार पत्र इसे दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन की संज्ञा दे रहे थे और टीवी देखनेवालों को लग रहा था कि हिंदुस्तान किसी बडे. बदलाव की दहलीज पर खड़ा है और जल्द ही सूरत बदलने वाली है. घरों में सोयी अवाम अचानक जाग गयी थी और राजनीति को अछूत समझनेवाला मध्यम वर्ग राजनैतिक रणनीति का ताना-बाना बुन रहा था. यहां मैं आंदोलन के राजनीतिक चरित्र की बात नहीं कर रहा, बल्कि यह याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि उस आंदोलन को उसके चरम तक पहुंचानेवाला मीडिया अपने पड़ोस बांग्लादेश में उठ रहे जन सैलाब के जानिब इतना उदासीन क्यों है और कुछ ही महीने पहले बढ़ी आवाम की राजनैतिक चेतना आज कहां है?
हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की अवाम युद्ध अपराधियों और फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ आंदोलन कर रही है. यह आंदोलन महज युद्ध अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए ही नहीं है, बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक समाज के लिए संघर्ष कर रहा है जो मजहबी कठमुल्लावादियों को मंजूर नहीं. वहां से मिल रही खबरों (जो अखबारों और चैनलों से एकदम नदारद हैं) के अनुसार लाखों लोग दिन-रात शाहबाग चौक पर धरना दिये बैठे हैं और देश के अन्य भागों में भी लोग इस तरह के प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैं. कई राजनैतिक विशेषज्ञ शाहबाग की तुलना ‘तहरीर स्क्वायर’ से कर रहे हैं और वहां से आ रही तसवीरों को देख कर लगता है कि ये तुलना बेवजह नहीं है. हैरानी की बात यह है कि इस आंदोलन से जुडी खबरों के लिए हिंदुस्तानी मीडिया के पास कोई जगह नहीं है. अमेरिका के चुनावों से काफी पहले हर हिंदुस्तानी को यह पता होता है कि अमेरिकी राजनीति में क्या खिचड़ी पक रही है. कौन से राज्य में रिपब्लिकन आगे हैं और किस में डेमोक्रेट. सट्टेबाज किस पर दावं लगा रहे हैं, इसका सीधा प्रसारण चौबीस घंटे होता है, पर पड़ोस में हो रहे इतने बडे. आंदोलन की हमारे देश की अवाम को इत्तला तक नहीं है. पिछले दो महीनों में हिंदुस्तान का मीडिया अपनी बहस और कवरेज नरेंद्र मोदी और राहुल के इर्द-गिर्द घुमा रहा है या इस गम में मातम मना रहा है कि आखिर शेयर बाजार इतना नीचे क्यों आ गया है या सोने के भाव गर्दिश में क्यों हैं. बांग्लादेश की घटनाएं किसी ‘न्यूज एट नाइन’ या ‘बिग फाइट’ का हिस्सा नहीं बन पायीं. सुना है आंदोलन के पहले महीने में ‘हिंदू’ को छोड. कर किसी हिंदुस्तानी अखबार का संवाददाता ढाका में मौजूद नहीं था और उसके बाद भी इस आंदोलन की खबर ढूंढे. नहीं मिलती. अत्रा आंदोलन के समय का राजनैतिक तौर पर सजग समाज आज कहां चला गया? अमेरिका में अगला प्रेसिडेंट कौन होगा पर एडिटोरियल लिखनेवाले अखबारों को क्या हुआ? क्यों पड़ोस में हो रही घटनाएं उनका ध्यान खींचने में नाकामयाब हैं?
शुक्र है बांग्लादेशी ब्लॉगरों का और उन ब्लॉगों के आधार पर कुछ जनवादी लेखकों द्वारा सोशल साइट पर किये गये अपडेट का कि हमें हिंदुस्तान में शाहबाग आंदोलन की कुछ खबरें मिल सकीं. लेकिन दुनिया को शाहबाग आंदोलन की खबर देने की कीमत ब्लॉगर अहमद रजिब हैदर को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के खिलाफ लिखने और युद्ध अपराधियों को कड़ी सजा की हिमायत करने के कारण उनकी हत्या कर दी गयी और अन्य चार ब्लॉगर जेल की सलाखों के पीछे हैं.
1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष में भारत की अहम भूमिका रही थी और हम अक्सर इस बात पर अपनी पीठ भी ठोंकते रहते हैं. लेकिन आज भारत इस कदर कूटनीतिक चुप्पी साधे बैठा है कि मानो उसके पूर्व में कोई देश हो ही ना. भारत की तरफ से बांग्लादेश की उथल-पुथल पर कोई टिप्पणी नहीं की गयी है. विदेश मंत्री पर थोड़ा दवाब डाल कर पूछोगे तो वह कहेंगे, ‘‘यह उनका अंदरूनी मामला है और भारत किसी के अंदरूनी मामलों में दखल देना उचित नहीं समझता.’’ 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करते वक्त ये अंदरूनी मामला नहीं था, लेकिन आज है. हैरानी की बात यह है कि प्रगतिशील और जनवादी खेमे में भी इस आंदोलन को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती. वामपंथी पार्टियों की चुप्पी चुभनेवाली है. भारत का प्रगतिशीत तबका इस सवाल से मुंह नहीं मोड. सकता और उसे तारीख को जवाब देना होगा कि वह बांग्लादेशी तहरीक के साथ एकजुटता क्यों नहीं जता सका. किसी पार्टी या संगठन ने बांग्लादेश के जन आंदोलन के सर्मथन में कोई रैली, धरना या प्रदर्शन नहीं किया (कुछ अपवादों को छोड. कर). हां, कोलकाता में दर्जन भर मुसलिम संगठनों के हजारों सर्मथकों ने शहीद मीनार पर प्रदर्शन जरूर किया था. लेकिन शाहबाग आंदोलन के सर्मथन में नहीं, बल्कि उन युद्ध अपराधियों के सर्मथन में, जिन्हें युद्ध अपराधों के लिए सजा सुनायी गयी है. सुनने में आया है कि पाकिस्तान में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए जिसमे युद्ध अपराधियों को रिहा करने की मांग की गयी है. यह भी खबर है कि कुछ इस्लामी देशों की सरकारों ने भी युद्ध अपराधियों को रिहा करने की इल्तजा की है. दुनिया की जनवादी ताकतें एक हों, ना हों, पर दुनिया भर की फिरकापरस्त ताकतें एक साथ खड़ी हैं.
शाहबाग आंदोलन धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल्यों में यकीन करनेवाला एक ऐसा आंदोलन है जो 1971 के युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहा है. साथ ही, उसके लिए जिम्मेदार जमात-ए- इसलामी पर पाबंदी लगाने कि मांग कर रहा है. 1971 में बांग्लादेश की आजादी के आंदोलन के समय जमात-ए-इसलामी जैसे संगठनों ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था और बांग्लादेश में हुए नरसंहार में बराबर के भागीदार बने थे. इस नरसंहार में लगभग तीन से पांच लाख मुक्ति-संघर्ष के सर्मथकों की हत्या की गयी थी. हालांकि इस संख्या पर विवाद है, पर इस बात पर कोई दो राय नहीं कि हजारों की संख्या में लोगों को मारा गया था. आज भी बांग्लादेश में सामूहिक कब्रगाहें मिल रही हैं, जहां नरसंहार के बाद लोगों को दफनाया गया था. इसके अलावा पाकिस्तानी सेना पर हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार का आरोप है और एक घटना में तो पाकिस्तानी सेना ने ढाका विश्‍वविद्यालय और घरों से 500 से अधिक महिलाओं को अगवा करके अपनी छावनी में बंधक बना कर रखा था और कई दिनों तक उनके साथ बलात्कार किया था. बांग्लादेश की फिरकापरस्त ताकतें नहीं चाहती थीं कि उनका देश इसलामी राज्य पाकिस्तान से आजाद हो कर धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राज्य बने. वे अखंड पाकिस्तान के हिमायती थे और आजाद बांग्लादेश के विरोधी. इसी कारण उन्होंने पाकिस्तानी सेना और फिरकापरस्त ताकतों का साथ दिया और इस नरसंहार का हिस्सेदार बने.
सन् 2008 के चुनावों के दौरान अवामी लीग ने वादा किया था कि वह युद्ध अपराधियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आइसीटी) का गठन करेगी और युद्ध अपराधियों के खिलाफ केस चलायेगी, जिसकी मांग सालों से चली आ रही थी. चुनाव जीतने के बाद सन् 2009 में आइसीटी की स्थापना हुई और उन अपराधियों के खिलाफ केस शुरू हुआ जो युद्ध अपराधों में शामिल थे. फरवरी 2013 में युद्ध अपराधियों के खिलाफ सजा सुनायी गयी जिसमें जमाते इसलामी के नेता हुसैन सैयदी भी शामिल थे. दो हफ्ते बाद एक और जमाते इसलामी नेता, अब्दुल कादिर मुल्ला, को सजा सुनायी गयी. इसके जवाब में जमाते इसलामी के छात्र संगठन ‘शिबिर’ ने इस निर्णय की मुखालफत में जो कहर बरपाया, उसकी मिसाल कम ही देखने को मिलेगी. हिंसा के इस तांडव में एक ही दिन में 35 लोग मारे गये. दक्षिणी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के घरों और मंदिरों पर भी हमला बोला गया. इसके साथ ही ढाका के शाहबाग इलाके में जमाते इसलामी नेताओं के खिलाफ और युद्ध अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हुए शाहबाग आंदोलन शुरू हुआ जो कि पूर्णत: अहिंसक था. तब से लेकर आज तक ये आंदोलन जारी है और फिरकापरस्तों के खिलाफ लड. रहा है.
आज भी जमात-ए-इसलामी के सर्मथक शाहबाग आंदोलन के खिलाफ यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि ये आंदोलन नास्तिक युवाओं द्वारा चलाया जा रहा है जो इस्लाम विरोधी है. सच्चाई यह है कि इस आंदोलन में हर तबके और उम्र के लाखों लोग शामिल हैं. ढाका के शाहबाग इलाके से शुरू हुए इस आंदोलन के सर्मथक देश के कोने-कोने में हैं. इसलाम में तहे दिल से यकीन करनेवाले मुसलिम भी इसका भाग हैं, लेकिन वे जमात जैसे संगठनों और धर्म पर आधारित राज्य का विरोध करते हैं. ये आंदोलन न केवल युद्ध अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहा है, बल्कि जमात-ए-इसलामी जैसे दक्षिणपंथी संगठनों पर पाबंदी की मांग भी कर रहा है. इस आंदोलन के अपराधियों को फांसी पर चढ़ाने की मांग पर मतभेद हो सकते हैं, पर आंदोलन के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर शक की गुंजाइश नहीं है.
हिंदुस्तानी मीडिया की आंदोलन के प्रति उदासीनता और हिंदुस्तानी जनवादी ताकतों का आंदोलन के सर्मथन में न आना हैरानी के साथ साथ चिंता का विषय भी है. खास कर जब दुनिया भर में कठमुल्लावादी राजनीति हावी हो रही है. मीडिया की बात समझ में आती है कि इस आंदोलन को कवर करने से उसके आर्थिक हितों की पूर्ति नहीं होती, पर प्रगतिशील ताकतों की क्या मजबूरी है? शाहबाग आंदोलन के सर्मथन में कुछ इक्का-दुक्का प्रदर्शन तो हुए हैं, पर उनका अस्तित्व समुद्र में बारिश की बूंद-सा है. आओ मिल कर बांग्लादेश के लोगों को शुभकामनाएं दें कि उन्हें उनके मकसद में कामयाबी मिले और धर्मनिरपेक्ष और तरक्कीपसंद लोगों की जीत हो. साथ ही हम हिंदुस्तानी ये संकल्प लें कि बांग्लादेश के जनवादी आंदोलन के प्रति जितना हो सके उतना सर्मथन जुटायेंगे. शाहबाग आन्दोलन में जुटे लोगों को सलाम.
(लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेशनल हैं और पिछले 20 साल से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं.) 

साभार : http://nsi-delhi.blogspot.in/
साभार:


शुक्रवार, 3 मई 2013

भारतीय न्याय-प्रणाली (भाग- 3)



       इस समय हमारी जनसंख्या और जजों का जो अनुपात है, वह काफी कम है। करीब दस लाख पर 12 जज हैं। यह अनुपात मजिस्ट्रेट से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक का है। अगर देखा जाय, तो औसतन प्रत्येक जिले में 20 अपराध रोज होते हैं। पर इनको निपटाने के समुचित साधन नहीं हैं।
कानूनी प्रक्रिया इतनी बड़ी और लम्बी होती है, कि कोई एक दिन में अपराध तय नहीं हो पाता।
       जिस अनुपात में अपराध बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए हमारे पास न तो न्यायाधीश हैं, न ही न्यायालय।
       अपराधियों को इस बात का डर ही नहीं है कि उन्हें सजा मिल सकती है। वे बेखौफ होकर अपराध कर रहे हैं।     
1967 में 80 फीसद मामलों में फैसले होते थे। आज कन्विक्शन दर 16 से 18 फीसद रह गया है। वह भी छोटे-मोटे मामले में।      
***
दुःख की बात है कि कानून व्यवस्था ठीक हो, इसके लिए सरकार के पास पूँजी नहीं है, लेकिन बेवजह पैसे खर्च करने के लिए उसके पास पूँजी है। समाज को व्यवस्थित और नयी दिशा देने की, महिलाओं के प्रति सम्मान कायम रहे इत्यादि बातों की चिन्ता इन्हें नहीं है।
***
आज देश में विभिन्न मुद्दों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। पर न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होता है; न तो कहीं से कोई माँग उठती है। आज अपराधी राजनीति में घुसे हुए हैं। नौकरशाह भी आपराधिक मामलों में संलिप्त हैं। वे सभी फायदे में हैं। ऐसे में, उन्हें क्या जरुरत पड़ी है इसे सुधारने की! उनके लिए तो न्यायालय ही खत्म हो जाय, वही अच्छा रहेगा।
***
लोगों में एक तरह का भ्रम पैदा किया गया है कि न्याय प्रक्रिया पेचीदा और जटिल है, इसलिए फैसले आने में देरी होती है। पर यह प्रक्रिया बिलकुल सीधी है। इसे तो पेचीदा बनाया गया है। यह वही बनाता है, जो इस पेशे में है- यानि वकील, जो वहाँ खड़े होते हैं। वैसे भी, यदि लगातार ऐसा महसूस किया जा रहा है कि यह प्रक्रिया पेचीदी है, तो संसद इसमें संशोधन कर सरल बना दे।
***
लॉ कमीशन की सिफारिशों को सरकार कूड़ेदान में फेंक देती है। लागू करने का सवाल कहाँ है? इन सिफारिशों को लागू करने में पैसा लगना है, तो पैसा कौन दे? सरकार के लिए तो न्यायालय अहमियत की चीज ही नहीं है। लोकतंत्र में न्यायालय को रखना है, इसलिए है। बाकी इन लोगों की इच्छा तो है ही नहीं कि न्यायालय हो, या फिर, सक्रिय रहे। यहाँ बेईमान, भ्रष्टाचारी और अनैतिक काम करने वाले हैं, उन सबको क्या न्यायालय का सक्रिय होना ठीक लगेगा?
***
न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए एक साल में एक हजार करोड़ रुपये भी नहीं दिये सकते। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ इस काम के लिए न तो कोई राज्य सरकार इच्छुक है, न ही केन्द्र सरकार। सभी कहते हैं कि भई, पैसे नहीं हैं। वे टेलीविजन बाँटेंगे, मोबाइल फोन देंगे, पर समाज के लिए जो बुनियादी जरुरत की चीज है, उसके लिए कुछ नहीं करेंगे।
*****
(साभार उद्धृत अंश: समाचार-विचार पाक्षिक "प्रथम प्रवक्ता", नोएडा, उप्र, अंक- 1-15 फरवरी 2013, आलेख- 'कानून का भय खत्म हो गया है: वी.एन. खरे', पूर्व-न्यायाधीश विशेश्वर नाथ खरे से बातचीत- मीतू कुमारी)

भारतीय न्याय-प्रणाली (भाग- 2)



       जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें सरकार या फिर न्यायपालिका की कार्य प्रक्रिया को बेहतर बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, जबकि आम आदमी परेशान है। वह भुगत रहा है। सत्ता में बैठे लोग तो उल्टा इसका फायदा उठा रहे हैं। जो भ्रष्ट लोग हैं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई ही कोर्ट में नहीं चल पाती है। वे सत्ता का सुख भोगते रहते हैं। दूसरी तरफ जो अपराध करते हैं, उनको भी इससे फायदा हो रहा है।
***
       जब न्यायपालिका जल्दी-जल्दी काम नहीं करती, उस वक्त बड़ी-बड़ी कम्पनियों को जब ऑर्बिटेशन करवाना होता है, तो वे सेवा-निवृत्त जजों को ऑर्बिट्रेटर नियुक्त करती हैं। दो लाख रुपया रोजाना जजों को बतौर शुल्क देती हैं। बड़ी संख्या में ऐसे सेवा-निवृत्त जज हैं, जो करोड़ों रुपये ऑर्बिट्रेटर के नाम पर कमा रहे हैं। यदि अदालत जल्दी-जल्दी काम करने लगे, तो इनका यह काम-धन्धा बन्द हो जायेगा। यही कारण है कि समस्या का हल ढूँढ़ने में जजों की तरफ से भी कोई पहल नहीं होती।
       ***
       वर्तमान समय में हमारी जो पुलिस व्यवस्था है, वह अँग्रेजों की बनायी हुई है। अँग्रेजों ने इस व्यवस्था को इसलिए नहीं बनाया था कि हिन्दुस्तान की आम जनता को इससे सुरक्षा मिले, या फिर, जो लोई अपराध करे, उसे तुरन्त सजा मिले। उन्होंने इस व्यवस्था को इस उद्देश्य से बनाया था कि उनकी अपनी हुकूमत बनी रहे। इसलिए पुलिस पर नियंत्रण बिलकुल ऊपर से था। उसकी जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं थी। उस समय लोकतंत्र भी नहीं था।
       लेकिन जब लोकतंत्र आया, हिन्दुस्तान आजाद हुआ, संविधान बना, तो यह मान लिया गया कि आज से इस देश की जनता ही सबकुछ है। लेकिन अँग्रेजों ने पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका की जो संरचना बनायी थी, उसमें भी संरचनात्मक बदलाव की जरुरत थी। पर ये जरुरी बदलाव नहीं किये गये। यह जरूरी था कि ऊपर से नियंत्रण को कम किया जाय। इन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाय। पर ऐसा नहीं हो सका है।
इसका परिणाम है कि शीर्ष पर बैठे लोग अपराध करने लगे हैं। कई मंत्री, सांसद और विधायक अपराधी हैं। कई नौकरशाह भी अपराध में संलिप्त हैं। अब इन्हीं के हाथों में पुलिस का नियंत्रण है। ऐसी स्थिति में वे लोग पुलिस का दुरुपयोग बखूबी करते हैं। अब जब नियंत्रण करने वाले ही दुरुपयोग करते हैं, तब वे स्वतः पुलिस को नियंत्रित करने का हक खो देते हैं। पुलिस उनके हाथों से बाहर हो जाती है और अपनी शक्ति का दुरुपयोग करती है।
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न्यायाधीशों की जवाबदेही भी तय हो। आज तो इनकी कोई जवाबदेही ही नहीं है। आप किसी के पास न्यायाधीश की शिकायत नहीं कर सकते। किसी के पास भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने का अधिकार नहीं है। उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया भी पारदर्शी नहीं है। आवश्यक है कि न्यायपालिका को भी पारदर्शी बनाया जाय।
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(साभार उद्धृत अंश: समाचार-विचार पाक्षिक "प्रथम प्रवक्ता", नोएडा, उप्र, अंक- 1-15 फरवरी 2013, आलेख- 'पुलिस और न्यायपालिका में सुधार की जरुरत', लेखक- प्रशान्त भूषण)

घिर गयाहै देश! (भाग- 2)

कब जागेगा हमारा ‘राष्ट्रीय संकल्प’? 

गतांक से जारी..

ली क्वान यू के बारे में कहते हैं कि जब वह कुछ कहते हैं, तो दुनिया के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजनयिक और सीइओ सुनते हैं. पिछले 50 वर्षों से वह दुनिया के रंगमंच पर हैं. इस पुस्तक में कई अध्याय हैं. पर, इसकी शुरुआत ही ‘द फ्यूचर ऑफ चायना’ (चीन का भविष्य) से है. इस पुस्तक में एक छोटा अध्याय ‘द फ्यूचर ऑफ इंडिया’ (भारत का भविष्य) भी है. हालांकि, भारत से जुडे. अध्याय का उल्लेख कवर पर नहीं है. कारण और संकेत साफ है कि भारत की अहमियत चीन के बराबर नहीं है. 


इस अध्याय में ली से चीन के भविष्य पर पूछे गये सवाल हैं कि चीन कैसे दुनिया में नंबर एक बन रहा है? अपने पड़ोसी देशों के साथ उसका बरताव कैसा रहेगा? अमेरिका से उसके संबंध कैसे होंगे? वगैरह-वगैरह. बहुत कम शब्दों में चीन की प्रगति पर ली की टिप्पणी दृष्टिसंपत्र है. वह कहते हैं कि चीनी लोगों ने एक गरीब चीनी समाज को आर्थिक चमत्कार से बदल दिया है. आज दुनिया की वह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. गोल्डमैन सैक्स की भविष्यवाणी है कि अगले 20 वर्षों में चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थावाला देश होगा. चीन ने अमेरिका की तरह अंतरिक्ष में अपने लोग भेजे हैं. चीन के पास चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता है. 130 करोड. की आबादी है. प्रतिभाशाली लोग हैं. इसलिए चीन के मानस में एशिया में नंबर एक और फिर दुनिया में नंबर एक बन जाने की आकांक्षा स्वाभाविक है. आज चीन दुनिया में सबसे तेज विकास करनेवाला देश है. उसकी विकास दर स्तब्ध करनेवाली है. हैरत में डालनेवाली है. चीनी लोगों ने बडे. सपने देखे हैं. बड़ी आकांक्षाएं पाली हैं. आज हर चीनी एक मजबूत और संपत्र चीन चाहता है. समृद्ध देश चाहता है. विकसित और अग्रणी मुल्क चाहता है. तकनीकी रूप से सक्षम अमेरिका, यूरोप और जापान के मुकाबले. चीनी अवाम ने अपनी नयी नियति लिखने में अपनी ऊर्जा लगा ली है. पूरा मुल्क एक सपने से संचालित है.



इसके बरक्स आज भारत की तसवीर का आकलन करिए. आज कहां है, मुकम्मल भारत का सपना? क्षेत्रीय दलों और छत्रपों की मंडियों और गलियों में खो गया है. कहां है, मुल्क के प्रति उत्कट भावना और देश-प्रेम? ली, चीन का अतीत और स्वभाव बताते हैं. चीनियों को साम्राज्यवाद की कॉलोनी (उपनिवेश) बनने के पहले की दुनिया याद है. उनके मानस में उसके बाद के शोषण और अपमान याद हैं. अपने इस अपमान की धुंध में चीनी नेतृत्व ने कई दशकों पहले चीन को महाशक्ति बनाने का सपना देखा. आज वह सपना फलीभूत हो रहा है. चीन में, चीन का अर्थ है, मध्यकाल का साम्राज्य यानी वह संसार, जब चीनियों का लगभग पूरे एशिया में बोलबाला था. अन्य देश उनके मातहत थे. चीन के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते थे. नजराना देते थे. ब्रुनेई के सुल्तान का एक मकबरा बीजिंग में है. वह जहाजों का बेड़ा लेकर, उन पर श्रेष्ठ सिल्क (रेशम) लाद कर चीनी शासकों को नजराना पेश करने बीजिंग आये थे. भेंट देने के समय ही वह मर गये. 400 वर्ष पहले चीन में उनकी समाधि बनी. ली कहते हैं कि क्या एक औद्योगीकृत और मजबूत चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के प्रति उसी तरह उदार, दयालु, भद्र या सौम्य रहेगा, जैसे अमेरिका 1945 के बाद रहा है? ली का निष्कर्ष है कि चीन के ऐसे बरताव के प्रति सिंगापुर आश्‍वस्त नहीं है. इसी तरह इंडोनेशिया, मलयेशिया, फिलीपींस और वियतनाम.. वगैरह देश, चीन को आज आत्ममुग्ध और कठोर कदम उठाने का मानस रखनेवाले मुल्क के रूप में देख रहे हैं. एशिया के अनेक छोटे देश चिंतित हैं कि चीन फिर अपने उसी साम्राज्यवादी (इंपीरियल स्टेट) दौर में लौटना चाहेगा, जो चीन के इतिहास या मध्यकाल का दौर है. ऐसी शंका है कि वह अन्य राज्यों के साथ जागीर, मातहत, अधीन या दास राज्यों के रूप में व्यवहार करेगा, उसी तरह जब अतीत की शताब्दियों में चीन के पड़ोसी देशों को उसे नजराना देना पड.ता था. आज चीन के पास अत्यंत कुशल और शिक्षित मानव संपदा है. चीनी टीवी में एक सीरियल ‘द राइज ऑफ ग्रेट पावर्स’ पार्टी के द्वारा तैयार किया गया. पूरे मुल्क में दिखाया गया. चीन लगातार सिलसिलेवार उसका अनुकरण कर रहा है. यह सीरियल चीन के बौद्धिक वर्ग के विर्मश से तैयार किया गया है. अब एक क्षण आप इस संदर्भ में भारत के बारे में सोचिए. आज भारत के पास क्या अतीत-बोध है? भविष्य का सपना और नक्शा है? भारत के किसी राजनीतिक दल के पास एक पुख्ता भारत का सपना है? पर चीन दशकों से इसी सपने के इर्द-गिर्द अपने देश का मानस बनाता रहा है. चीन आज अपने युवकों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा देने की होड. में है. वह अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को विज्ञान और तकनीक में उतार रहा है. इसके बाद के बच्चों को अर्थशास्त्र, बिजनेस मैनेजमेंट और अंगरेजी भाषा में दक्ष बना रहा है. चीन के इस विकास मॉडल के थिंक टैंक (चिंतक समूह) के एक वरिष्ठ सदस्य ली से मिले. चीन के विकास के बारे में पूछा? ली का जवाब था, शांतिपूर्ण, पुनर्जागरण, पुनरुत्थान (इवोल्यूशन) या विकास? पर ली ने शंका साफ की. कहा कि आप (चीन) अपनी युवा पीढ़ी में अत्यधिक आत्मगौरव (प्राइड) और देशभक्ति (पेटट्रिज्म) भर रहे हैं. यह अत्यंत उग्र और अस्थिर है. अब आप भारत के लोगों के मानस की तुलना चीन के इस मानस से करिए. कहां ठहरते हैं, हम उनके मुकाबले? ली कहते हैं कि चीन, बिना सेना इस्तेमाल किये या ताकत दिखाये अनेक देशों को अपनी अर्थव्यवस्था में समाहित कर लेता है या खींच लेता है. सोख लेता है. चीन की रणनीति है, अपना प्रभाव बढ़ाना. अपनी ताकतवर अर्थव्यवस्था के बल. पीछे ताकतवर अर्थव्यवस्था और उसी के बल विदेश नीति की डिप्लोमेसी. हर बात के पीछे अर्थ-संपदा और सबसे ताकतवर सैन्य बल का छिपा संदेश. ब्रिटेन के साम्राज्यवाद के दौर को याद करें या अमेरिका के उफान-उत्कर्ष के दिन. सीधा फॉर्मूला है, मजबूत अर्थव्यवस्था, अत्यंत सक्षम मानव संपदा, सर्वश्रेष्ठ इंफ्रास्ट्रक्चर, अत्यंत मजबूत सेना और फिर दुनिया को नचाने की ताकत बगैर कहे पाना. इसी फॉर्मूला के तहत आज चीन अपने उत्कर्ष के शीर्ष पर जगह बना रहा है. भारत ने पिछले 30-40 वर्षों में अपने पुनर्निर्माण का वह सपना, संकल्प, आत्मविश्‍वास और जज्बा ही खो दिया है. चीन, दुनिया को काबू करने की ताकत हासिल कर चुका है. हम, भारतीय देश में हो रहे रेप, स्कैंडल, लूट, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, चोरी, आपसी वैर, जाति, धर्म और क्षेत्र के झगड़ों में डूबे हैं.



बचपन की धुंधली स्मृति है. चीन आक्रमण के बाद की स्थिति. अपढ. महिलाएं जेवर उतार कर राष्ट्रीय कोष में दे रही थीं. देश के स्वाभिमान-सम्मान की रक्षा के लिए. एक अकेली अवाज की अनुगूंज बचपन में सुनी, वह भी गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की एक कविता की एक पंक्ति ‘चलो भाई बोमडिला’. गांव, कस्बे में गूंजती. तब न आज की तरह आवागमन के साधन थे, न प्रगति. पर भारत देश के लिए जज्बा था. बहुत बाद में चंद्रशेखर जी से जाना. वह 1962 में ही राज्यसभा गये थे. अकेले गुवाहाटी गये. टैक्सी लेकर तेजपुर. वहां के बाशिंदों का मनोबल बढ़ाने. यह जज्बा था, देश के प्रति. आज कहां खो गया ‘भारत’ का वह सपना, जिसके लिए हमारे पुरखे लडे.. बलिदान दिया. 



कुछेक वर्ष पूर्व शिलांग जाना हुआ. पता चला अरुणाचल में भारत-चीन सीमा पर प्राय: चीनी घुसपैठ की घटनाएं होती हैं. यह भी जानकारी मिली, सेना के बडे. स्रोतों से कि चीन ने अपनी सीमा में सड.क, संपर्क संसाधन वगैरह का अद्भुत विकास किया है. हम आज भी खारों से सामान ढोकर सीमा तक पहुंचाते हैं. अब यह मुकाबला एकतरफा है. चीन की बात तो छोड़ें, बाहरी पूंजी आज भारत में आने को तैयार नहीं. वह अधिक मात्रा में बांग्लादेश जा रही है. चीन से तो कोई मुकाबला ही नहीं है. वहां उसकी शर्तों पर बाहरी पूंजी की बाढ. है. इसके लिए सिर्फ भारत सरकार दोषी नहीं, हमारी पूरी राजनीति दोषी है. जो विदेशी निवेशक आते हैं, उनके पीछे हम सीबीआइ, आयकर वगैरह की जांच लगा देते हैं, घूस उन्हें अलग से देना पड.ता है. अब ऐसी स्थिति में कौन यहां आना चाहेगा? एक तरफ आपने उदारवादी अर्थनीतियां या बाजार व्यवस्था अपना ली है, दूसरी तरफ ‘लाइसेंस, कोटा, परमिट’ राज के मानस से काम कर रहे हैं. तो यह अंतर्विरोध होगा ही. या फिर स्वदेशी के रास्ते हम अपना विकास कर लें? दरअसल, हम कनफ्यूज्ड कौम हैं. बात आदर्श की करेंगे, पर हर पाप भी स्वीकार्य है. चीन ने दुनिया के ‘विचारों’ में नया इतिहास लिख दिया है. साम्यवादी देश ने अपने विकास का मॉडल बनाया, ‘मार्केट इकोनॉमी’ (बाजार अर्थव्यस्था) को. दो विचारों के संगम से निकली चीज से बना यह चीनी विकास मॉडल. इसके मूल में चीन के विकास की बात अहम थी. राष्ट्रीय गौरव या चीन को सुपरपावर बनाने का सपना सबसे अहम था. साम्यवाद या पूंजीवाद का सिद्धांत नहीं? यही देंग ने कहा भी था. पर भारत न गांधीवादी रहा, न नेहरूवादी, न समाजवादी, न पूरी तरह बाजार व्यवस्था को ही अपना सका. 



देश को गढ.नेवाली हमारी राजनीति आज कैसी है? बेअंत सिंह के हत्यारे को फांसी की सजा न मिले, यह प्रस्ताव पास होता है. इसी तरह राजीव गांधी के हत्यारे को सजा न मिले, यह सवाल उठता है. कोई राज्य, देश की विदेश नीति पर सवाल खड़ा करता है, क्या यही भारत है? और यह सब सिर्फ वोट और सत्ता के लिए हो रहा है. ली क्वान यू ने अपनी पुस्तक में भारत के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण बातें कही हैं. वह कहते हैं, भारत ‘महान’ न बन सकनेवाला देश है. इसकी क्षमता और संभावनाओं का इस्तेमाल भी नहीं हुआ है. इसकी क्षमता की धरती आज भी बंजर, परती और खाली है. वह कहते हैं, राज्यों में आपसी सीमाओं को लेकर, भाषाई प्रतिबद्धता को लेकर, जातिगत कोटे के सवाल पर झगडे. होते रहेंगे. भारतीय नौकरशाही सिर्फ अत्यंत सुस्त ही नहीं है, वह परिवर्तन विरोधी भी है. क्षेत्रीय धक्कमधक्का और भ्रष्टाचार, भारत की मदद नहीं कर रहे. भारत के पास र्जजर इंफ्रास्ट्रक्चर है. बिजनेस की दृष्टि से अत्यंत केंद्रीकृत और अवरोधक व्यवस्था है. बेकाबू राजकोषीय घाटा.. इन सबसे न नौकरियां बढ. रही हैं, न निवेश आ रहे हैं. न भारतीय अर्थव्यवस्था बढ. रही है. 



ली आगे कहते हैं कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि यहां, जो सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हैं, वे शीर्ष पर नहीं पहुंचतीं. यह सामंती मिजाज का देश है, जहां आपका जन्म (यानी आप जिस जाति या धर्म में जन्मते हैं), आपका भविष्य तय करता है. भारत के अधिकतर इंजीनियरों और ग्रेजुएट छात्रों के पास ‘स्किल’ नहीं है. इस तरह भारत विकास के नक्शे में 40 वर्ष गंवा चुका है. अपनी रणनीति या अर्थनीति के कारण. ऐसी अनेक महत्वपूर्ण बातें ली ने कही हैं, भारत के संदर्भ में.



क्या चीन से बार-बार अपमानित होने के बाद भी हमारा ‘राष्ट्रीय संकल्प’ जगेगा? इन सवालों पर हमारी राजनीति, हमारे नेता व बौद्धिक विर्मश करेंगे?

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प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश जी के कलम से, 
साभार:
http://epaper.prabhatkhabar.com/epapermain.aspx?pppp=10&queryed=16&eddate=4/29/2013%2012:00:00%20AM