बुधवार, 8 मई 2013

"गीतांजली" से-


  
       कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्मदिन ईस्वी सम्वत् के हिसाब से 7 मई को और बँगला सम्वत् के हिसाब से 25 बैशाख को मनाया जाता है। परसों 7 मई था और आज "25शे बैशाख" (बंगाब्द 1420) है। इस अवसर मैं कविगुरू को सादर नमन करता हूँ और "गीतांजली" से 2 कवितायें उद्धृत करता हूँ। ये अनुवाद सत्यकाम विद्यालंकार द्वारा किये गये हैं और यह संग्रह 'राजपाल' वालों द्वारा प्रकाशित है। अनुवाद में मैंने अपनी तरफ से दो-एक मामूली बदलाव भी किये हैं।  
       देवालय
      (भजन, पूजन, साधन, आराधना)
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       पुजारी! भजन, पूजन, साधन, आराधना, इन सबको किनारे रख दे।
       द्वार बन्द करके देवालय के कोने में बैठा है?
       अपने मन के अन्धकार में छिपा बैठा, तू कौन-सी पूजा में मग्न है?
       आँखें खोलकर जरा देख तो सही, तेरा देवता तेरे देवालय में नहीं है!
       जहाँ कठोर जमीन को नरम करके किसान खेती कर रहे हैं,
       जहाँ मजदूर पत्थर तोड़कर रास्ता तैयार कर रहे हैं,
       तेरा देवता वहीं चला गया है!
      
       वे धूप-बरसात में सदा एक-समान तपते-झुलसते हैं,
       उनके दोनों हाथ मिट्टी में सने हैं,
       उनके पास जाना है तो सुन्दर परिधान त्याग कर मिट्टी-भरे रास्ते से जा!
       तेरा देवता देवालय में नहीं है,
भजन, पूजन, साधन को किनारे रख दे!
       ***
       कृपण
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मैं उस समय गाँव के द्वार-द्वार पर भिक्षा माँग रहा था
जब तेरा स्वर्ण रथ दूरी पर दिखायी दिया,
मैंने मानो कोई सुन्दर सपना-सा देखा हो।
मेरे विस्मय की सीमा न थी कि यह राजाओं का राजा कौन है, जो इधर आ रहा है?

मेरी आशाओं ने सिर उठाया, सोचा, शायद मेरे दुर्भाग्य की घड़ियाँ समाप्त हो गयीं।
मैं वहीं खड़ा हो गया और सोचने लगा-
कब रथ की धूल में स्वर्ण-मुहरें गिरेंगी और राजा के हाथ भिखारियों की झोलियाँ भरने को उठेंगे!

वह रथ अचानक वहीं ठहरा, जहाँ मैं खड़ा था।
तेरे नेत्र मुझसे मिले, तू मुस्कुराता हुआ रथ से नीचे उतरा।
मैंने सोचा, मेरा भाग्य-सूर्य अब उदय होने ही वाला है।
तब अचानक तूने मेरे पास आकर अपना दक्षिण हाथ मेरी ओर बढ़ा दिया
और कहा- 'मुझे देने को तू जो लाया है, दे दे।'

कितना विचित्र उपहास था।
एक राजा ने भिखारी के सामने भिक्षा के लिए हाथ फैलाया था।
मैं कुछ देर विस्मय-मुग्ध खड़ा देखता रहा।
फिर अपनी झोली से चावल की सबसे छोटी कनी निकालकर तेरे हाथ में रख दी।

किंतु मेरे आश्चर्य की सीमा न रही
जब दिन ढलने पर मैंने अपनी झोली खाली की
और देखा कि मेरी झोली में पड़े चावल की कनियों में से एक कनी सोने की भी थी!
मैं रोने लगा, बहुत रोने लगा।
जो कुछ मेरी झोली में था,
वह सब तुझे क्यों न दे डाला!
*** 
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प्रश्न उठता है कि हमारा राष्ट्रगान "जन-गण-मन" क्या वाकई जॉर्ज पंचम का "प्रशस्ती गीत" है? 
अगर हाँ, तो इसके प्रति या इसके रचयिता रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रति हमारे मन में श्रद्धा क्योंकर उत्पन्न हो? 
इन प्रश्नों के उत्तर में जो कुछ मेरे मन में आया, उसे मैंने अपने ब्लॉग 'देश-दुनिया' में यहाँ लिखा है:- 

"जन-गण-मन" को "राष्ट्रधुन" होना चाहिए, न कि "राष्ट्रगान"

रविवार, 5 मई 2013

शाहबाग पर हमारी खामोशी


* लेखक: किशोर झा *
सन् 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अत्रा आंदोलन में उमडे. हजारों लोगों की तसवीरें आज भी जेहन में ताजा हैं. उन तसवीरों को टीवी और अखबारों में इतनी बार देखा था कि चाहे तो भी नहीं भुला सकते. लोग अपने-अपने घरों से निकल कर अत्रा के सर्मथन में इकट्ठे हो रहे थे और गली-मोहल्लों में भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगा रहे थे. इंडिया गेट से अखबारों और न्यूज चैनलों तक पहुंचते-पहुंचते सैकड़ों सर्मथकों की ये तादाद हजारों और हजारों की संख्या लाखों में पहुंच जाती थी. तमाम समाचार पत्र इसे दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन की संज्ञा दे रहे थे और टीवी देखनेवालों को लग रहा था कि हिंदुस्तान किसी बडे. बदलाव की दहलीज पर खड़ा है और जल्द ही सूरत बदलने वाली है. घरों में सोयी अवाम अचानक जाग गयी थी और राजनीति को अछूत समझनेवाला मध्यम वर्ग राजनैतिक रणनीति का ताना-बाना बुन रहा था. यहां मैं आंदोलन के राजनीतिक चरित्र की बात नहीं कर रहा, बल्कि यह याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि उस आंदोलन को उसके चरम तक पहुंचानेवाला मीडिया अपने पड़ोस बांग्लादेश में उठ रहे जन सैलाब के जानिब इतना उदासीन क्यों है और कुछ ही महीने पहले बढ़ी आवाम की राजनैतिक चेतना आज कहां है?
हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की अवाम युद्ध अपराधियों और फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ आंदोलन कर रही है. यह आंदोलन महज युद्ध अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए ही नहीं है, बल्कि एक धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक समाज के लिए संघर्ष कर रहा है जो मजहबी कठमुल्लावादियों को मंजूर नहीं. वहां से मिल रही खबरों (जो अखबारों और चैनलों से एकदम नदारद हैं) के अनुसार लाखों लोग दिन-रात शाहबाग चौक पर धरना दिये बैठे हैं और देश के अन्य भागों में भी लोग इस तरह के प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैं. कई राजनैतिक विशेषज्ञ शाहबाग की तुलना तहरीर स्क्वायरसे कर रहे हैं और वहां से आ रही तसवीरों को देख कर लगता है कि ये तुलना बेवजह नहीं है. हैरानी की बात यह है कि इस आंदोलन से जुडी खबरों के लिए हिंदुस्तानी मीडिया के पास कोई जगह नहीं है. अमेरिका के चुनावों से काफी पहले हर हिंदुस्तानी को यह पता होता है कि अमेरिकी राजनीति में क्या खिचड़ी पक रही है. कौन से राज्य में रिपब्लिकन आगे हैं और किस में डेमोक्रेट. सट्टेबाज किस पर दावं लगा रहे हैं, इसका सीधा प्रसारण चौबीस घंटे होता है, पर पड़ोस में हो रहे इतने बडे. आंदोलन की हमारे देश की अवाम को इत्तला तक नहीं है. पिछले दो महीनों में हिंदुस्तान का मीडिया अपनी बहस और कवरेज नरेंद्र मोदी और राहुल के इर्द-गिर्द घुमा रहा है या इस गम में मातम मना रहा है कि आखिर शेयर बाजार इतना नीचे क्यों आ गया है या सोने के भाव गर्दिश में क्यों हैं. बांग्लादेश की घटनाएं किसी न्यूज एट नाइनया बिग फाइटका हिस्सा नहीं बन पायीं. सुना है आंदोलन के पहले महीने में हिंदूको छोड. कर किसी हिंदुस्तानी अखबार का संवाददाता ढाका में मौजूद नहीं था और उसके बाद भी इस आंदोलन की खबर ढूंढे. नहीं मिलती. अत्रा आंदोलन के समय का राजनैतिक तौर पर सजग समाज आज कहां चला गया? अमेरिका में अगला प्रेसिडेंट कौन होगा पर एडिटोरियल लिखनेवाले अखबारों को क्या हुआ? क्यों पड़ोस में हो रही घटनाएं उनका ध्यान खींचने में नाकामयाब हैं?
शुक्र है बांग्लादेशी ब्लॉगरों का और उन ब्लॉगों के आधार पर कुछ जनवादी लेखकों द्वारा सोशल साइट पर किये गये अपडेट का कि हमें हिंदुस्तान में शाहबाग आंदोलन की कुछ खबरें मिल सकीं. लेकिन दुनिया को शाहबाग आंदोलन की खबर देने की कीमत ब्लॉगर अहमद रजिब हैदर को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के खिलाफ लिखने और युद्ध अपराधियों को कड़ी सजा की हिमायत करने के कारण उनकी हत्या कर दी गयी और अन्य चार ब्लॉगर जेल की सलाखों के पीछे हैं.
1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष में भारत की अहम भूमिका रही थी और हम अक्सर इस बात पर अपनी पीठ भी ठोंकते रहते हैं. लेकिन आज भारत इस कदर कूटनीतिक चुप्पी साधे बैठा है कि मानो उसके पूर्व में कोई देश हो ही ना. भारत की तरफ से बांग्लादेश की उथल-पुथल पर कोई टिप्पणी नहीं की गयी है. विदेश मंत्री पर थोड़ा दवाब डाल कर पूछोगे तो वह कहेंगे, ‘‘यह उनका अंदरूनी मामला है और भारत किसी के अंदरूनी मामलों में दखल देना उचित नहीं समझता.’’ 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करते वक्त ये अंदरूनी मामला नहीं था, लेकिन आज है. हैरानी की बात यह है कि प्रगतिशील और जनवादी खेमे में भी इस आंदोलन को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती. वामपंथी पार्टियों की चुप्पी चुभनेवाली है. भारत का प्रगतिशीत तबका इस सवाल से मुंह नहीं मोड. सकता और उसे तारीख को जवाब देना होगा कि वह बांग्लादेशी तहरीक के साथ एकजुटता क्यों नहीं जता सका. किसी पार्टी या संगठन ने बांग्लादेश के जन आंदोलन के सर्मथन में कोई रैली, धरना या प्रदर्शन नहीं किया (कुछ अपवादों को छोड. कर). हां, कोलकाता में दर्जन भर मुसलिम संगठनों के हजारों सर्मथकों ने शहीद मीनार पर प्रदर्शन जरूर किया था. लेकिन शाहबाग आंदोलन के सर्मथन में नहीं, बल्कि उन युद्ध अपराधियों के सर्मथन में, जिन्हें युद्ध अपराधों के लिए सजा सुनायी गयी है. सुनने में आया है कि पाकिस्तान में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए जिसमे युद्ध अपराधियों को रिहा करने की मांग की गयी है. यह भी खबर है कि कुछ इस्लामी देशों की सरकारों ने भी युद्ध अपराधियों को रिहा करने की इल्तजा की है. दुनिया की जनवादी ताकतें एक हों, ना हों, पर दुनिया भर की फिरकापरस्त ताकतें एक साथ खड़ी हैं.
शाहबाग आंदोलन धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल्यों में यकीन करनेवाला एक ऐसा आंदोलन है जो 1971 के युद्ध अपराधों के लिए जिम्मेदार गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहा है. साथ ही, उसके लिए जिम्मेदार जमात-ए- इसलामी पर पाबंदी लगाने कि मांग कर रहा है. 1971 में बांग्लादेश की आजादी के आंदोलन के समय जमात-ए-इसलामी जैसे संगठनों ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था और बांग्लादेश में हुए नरसंहार में बराबर के भागीदार बने थे. इस नरसंहार में लगभग तीन से पांच लाख मुक्ति-संघर्ष के सर्मथकों की हत्या की गयी थी. हालांकि इस संख्या पर विवाद है, पर इस बात पर कोई दो राय नहीं कि हजारों की संख्या में लोगों को मारा गया था. आज भी बांग्लादेश में सामूहिक कब्रगाहें मिल रही हैं, जहां नरसंहार के बाद लोगों को दफनाया गया था. इसके अलावा पाकिस्तानी सेना पर हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार का आरोप है और एक घटना में तो पाकिस्तानी सेना ने ढाका विश्‍वविद्यालय और घरों से 500 से अधिक महिलाओं को अगवा करके अपनी छावनी में बंधक बना कर रखा था और कई दिनों तक उनके साथ बलात्कार किया था. बांग्लादेश की फिरकापरस्त ताकतें नहीं चाहती थीं कि उनका देश इसलामी राज्य पाकिस्तान से आजाद हो कर धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राज्य बने. वे अखंड पाकिस्तान के हिमायती थे और आजाद बांग्लादेश के विरोधी. इसी कारण उन्होंने पाकिस्तानी सेना और फिरकापरस्त ताकतों का साथ दिया और इस नरसंहार का हिस्सेदार बने.
सन् 2008 के चुनावों के दौरान अवामी लीग ने वादा किया था कि वह युद्ध अपराधियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आइसीटी) का गठन करेगी और युद्ध अपराधियों के खिलाफ केस चलायेगी, जिसकी मांग सालों से चली आ रही थी. चुनाव जीतने के बाद सन् 2009 में आइसीटी की स्थापना हुई और उन अपराधियों के खिलाफ केस शुरू हुआ जो युद्ध अपराधों में शामिल थे. फरवरी 2013 में युद्ध अपराधियों के खिलाफ सजा सुनायी गयी जिसमें जमाते इसलामी के नेता हुसैन सैयदी भी शामिल थे. दो हफ्ते बाद एक और जमाते इसलामी नेता, अब्दुल कादिर मुल्ला, को सजा सुनायी गयी. इसके जवाब में जमाते इसलामी के छात्र संगठन शिबिरने इस निर्णय की मुखालफत में जो कहर बरपाया, उसकी मिसाल कम ही देखने को मिलेगी. हिंसा के इस तांडव में एक ही दिन में 35 लोग मारे गये. दक्षिणी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के घरों और मंदिरों पर भी हमला बोला गया. इसके साथ ही ढाका के शाहबाग इलाके में जमाते इसलामी नेताओं के खिलाफ और युद्ध अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हुए शाहबाग आंदोलन शुरू हुआ जो कि पूर्णत: अहिंसक था. तब से लेकर आज तक ये आंदोलन जारी है और फिरकापरस्तों के खिलाफ लड. रहा है.
आज भी जमात-ए-इसलामी के सर्मथक शाहबाग आंदोलन के खिलाफ यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि ये आंदोलन नास्तिक युवाओं द्वारा चलाया जा रहा है जो इस्लाम विरोधी है. सच्चाई यह है कि इस आंदोलन में हर तबके और उम्र के लाखों लोग शामिल हैं. ढाका के शाहबाग इलाके से शुरू हुए इस आंदोलन के सर्मथक देश के कोने-कोने में हैं. इसलाम में तहे दिल से यकीन करनेवाले मुसलिम भी इसका भाग हैं, लेकिन वे जमात जैसे संगठनों और धर्म पर आधारित राज्य का विरोध करते हैं. ये आंदोलन न केवल युद्ध अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहा है, बल्कि जमात-ए-इसलामी जैसे दक्षिणपंथी संगठनों पर पाबंदी की मांग भी कर रहा है. इस आंदोलन के अपराधियों को फांसी पर चढ़ाने की मांग पर मतभेद हो सकते हैं, पर आंदोलन के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर शक की गुंजाइश नहीं है.
हिंदुस्तानी मीडिया की आंदोलन के प्रति उदासीनता और हिंदुस्तानी जनवादी ताकतों का आंदोलन के सर्मथन में न आना हैरानी के साथ साथ चिंता का विषय भी है. खास कर जब दुनिया भर में कठमुल्लावादी राजनीति हावी हो रही है. मीडिया की बात समझ में आती है कि इस आंदोलन को कवर करने से उसके आर्थिक हितों की पूर्ति नहीं होती, पर प्रगतिशील ताकतों की क्या मजबूरी है? शाहबाग आंदोलन के सर्मथन में कुछ इक्का-दुक्का प्रदर्शन तो हुए हैं, पर उनका अस्तित्व समुद्र में बारिश की बूंद-सा है. आओ मिल कर बांग्लादेश के लोगों को शुभकामनाएं दें कि उन्हें उनके मकसद में कामयाबी मिले और धर्मनिरपेक्ष और तरक्कीपसंद लोगों की जीत हो. साथ ही हम हिंदुस्तानी ये संकल्प लें कि बांग्लादेश के जनवादी आंदोलन के प्रति जितना हो सके उतना सर्मथन जुटायेंगे. शाहबाग आन्दोलन में जुटे लोगों को सलाम.
(लेखक डेवलेपमेंट प्रोफेशनल हैं और पिछले 20 साल से बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं.) 

साभार : http://nsi-delhi.blogspot.in/
साभार:


शुक्रवार, 3 मई 2013

भारतीय न्याय-प्रणाली (भाग- 3)



       इस समय हमारी जनसंख्या और जजों का जो अनुपात है, वह काफी कम है। करीब दस लाख पर 12 जज हैं। यह अनुपात मजिस्ट्रेट से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक का है। अगर देखा जाय, तो औसतन प्रत्येक जिले में 20 अपराध रोज होते हैं। पर इनको निपटाने के समुचित साधन नहीं हैं।
कानूनी प्रक्रिया इतनी बड़ी और लम्बी होती है, कि कोई एक दिन में अपराध तय नहीं हो पाता।
       जिस अनुपात में अपराध बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए हमारे पास न तो न्यायाधीश हैं, न ही न्यायालय।
       अपराधियों को इस बात का डर ही नहीं है कि उन्हें सजा मिल सकती है। वे बेखौफ होकर अपराध कर रहे हैं।     
1967 में 80 फीसद मामलों में फैसले होते थे। आज कन्विक्शन दर 16 से 18 फीसद रह गया है। वह भी छोटे-मोटे मामले में।      
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दुःख की बात है कि कानून व्यवस्था ठीक हो, इसके लिए सरकार के पास पूँजी नहीं है, लेकिन बेवजह पैसे खर्च करने के लिए उसके पास पूँजी है। समाज को व्यवस्थित और नयी दिशा देने की, महिलाओं के प्रति सम्मान कायम रहे इत्यादि बातों की चिन्ता इन्हें नहीं है।
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आज देश में विभिन्न मुद्दों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। पर न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होता है; न तो कहीं से कोई माँग उठती है। आज अपराधी राजनीति में घुसे हुए हैं। नौकरशाह भी आपराधिक मामलों में संलिप्त हैं। वे सभी फायदे में हैं। ऐसे में, उन्हें क्या जरुरत पड़ी है इसे सुधारने की! उनके लिए तो न्यायालय ही खत्म हो जाय, वही अच्छा रहेगा।
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लोगों में एक तरह का भ्रम पैदा किया गया है कि न्याय प्रक्रिया पेचीदा और जटिल है, इसलिए फैसले आने में देरी होती है। पर यह प्रक्रिया बिलकुल सीधी है। इसे तो पेचीदा बनाया गया है। यह वही बनाता है, जो इस पेशे में है- यानि वकील, जो वहाँ खड़े होते हैं। वैसे भी, यदि लगातार ऐसा महसूस किया जा रहा है कि यह प्रक्रिया पेचीदी है, तो संसद इसमें संशोधन कर सरल बना दे।
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लॉ कमीशन की सिफारिशों को सरकार कूड़ेदान में फेंक देती है। लागू करने का सवाल कहाँ है? इन सिफारिशों को लागू करने में पैसा लगना है, तो पैसा कौन दे? सरकार के लिए तो न्यायालय अहमियत की चीज ही नहीं है। लोकतंत्र में न्यायालय को रखना है, इसलिए है। बाकी इन लोगों की इच्छा तो है ही नहीं कि न्यायालय हो, या फिर, सक्रिय रहे। यहाँ बेईमान, भ्रष्टाचारी और अनैतिक काम करने वाले हैं, उन सबको क्या न्यायालय का सक्रिय होना ठीक लगेगा?
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न्याय प्रक्रिया में सुधार के लिए एक साल में एक हजार करोड़ रुपये भी नहीं दिये सकते। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ इस काम के लिए न तो कोई राज्य सरकार इच्छुक है, न ही केन्द्र सरकार। सभी कहते हैं कि भई, पैसे नहीं हैं। वे टेलीविजन बाँटेंगे, मोबाइल फोन देंगे, पर समाज के लिए जो बुनियादी जरुरत की चीज है, उसके लिए कुछ नहीं करेंगे।
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(साभार उद्धृत अंश: समाचार-विचार पाक्षिक "प्रथम प्रवक्ता", नोएडा, उप्र, अंक- 1-15 फरवरी 2013, आलेख- 'कानून का भय खत्म हो गया है: वी.एन. खरे', पूर्व-न्यायाधीश विशेश्वर नाथ खरे से बातचीत- मीतू कुमारी)

भारतीय न्याय-प्रणाली (भाग- 2)



       जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें सरकार या फिर न्यायपालिका की कार्य प्रक्रिया को बेहतर बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, जबकि आम आदमी परेशान है। वह भुगत रहा है। सत्ता में बैठे लोग तो उल्टा इसका फायदा उठा रहे हैं। जो भ्रष्ट लोग हैं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई ही कोर्ट में नहीं चल पाती है। वे सत्ता का सुख भोगते रहते हैं। दूसरी तरफ जो अपराध करते हैं, उनको भी इससे फायदा हो रहा है।
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       जब न्यायपालिका जल्दी-जल्दी काम नहीं करती, उस वक्त बड़ी-बड़ी कम्पनियों को जब ऑर्बिटेशन करवाना होता है, तो वे सेवा-निवृत्त जजों को ऑर्बिट्रेटर नियुक्त करती हैं। दो लाख रुपया रोजाना जजों को बतौर शुल्क देती हैं। बड़ी संख्या में ऐसे सेवा-निवृत्त जज हैं, जो करोड़ों रुपये ऑर्बिट्रेटर के नाम पर कमा रहे हैं। यदि अदालत जल्दी-जल्दी काम करने लगे, तो इनका यह काम-धन्धा बन्द हो जायेगा। यही कारण है कि समस्या का हल ढूँढ़ने में जजों की तरफ से भी कोई पहल नहीं होती।
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       वर्तमान समय में हमारी जो पुलिस व्यवस्था है, वह अँग्रेजों की बनायी हुई है। अँग्रेजों ने इस व्यवस्था को इसलिए नहीं बनाया था कि हिन्दुस्तान की आम जनता को इससे सुरक्षा मिले, या फिर, जो लोई अपराध करे, उसे तुरन्त सजा मिले। उन्होंने इस व्यवस्था को इस उद्देश्य से बनाया था कि उनकी अपनी हुकूमत बनी रहे। इसलिए पुलिस पर नियंत्रण बिलकुल ऊपर से था। उसकी जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं थी। उस समय लोकतंत्र भी नहीं था।
       लेकिन जब लोकतंत्र आया, हिन्दुस्तान आजाद हुआ, संविधान बना, तो यह मान लिया गया कि आज से इस देश की जनता ही सबकुछ है। लेकिन अँग्रेजों ने पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका की जो संरचना बनायी थी, उसमें भी संरचनात्मक बदलाव की जरुरत थी। पर ये जरुरी बदलाव नहीं किये गये। यह जरूरी था कि ऊपर से नियंत्रण को कम किया जाय। इन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाय। पर ऐसा नहीं हो सका है।
इसका परिणाम है कि शीर्ष पर बैठे लोग अपराध करने लगे हैं। कई मंत्री, सांसद और विधायक अपराधी हैं। कई नौकरशाह भी अपराध में संलिप्त हैं। अब इन्हीं के हाथों में पुलिस का नियंत्रण है। ऐसी स्थिति में वे लोग पुलिस का दुरुपयोग बखूबी करते हैं। अब जब नियंत्रण करने वाले ही दुरुपयोग करते हैं, तब वे स्वतः पुलिस को नियंत्रित करने का हक खो देते हैं। पुलिस उनके हाथों से बाहर हो जाती है और अपनी शक्ति का दुरुपयोग करती है।
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न्यायाधीशों की जवाबदेही भी तय हो। आज तो इनकी कोई जवाबदेही ही नहीं है। आप किसी के पास न्यायाधीश की शिकायत नहीं कर सकते। किसी के पास भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने का अधिकार नहीं है। उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया भी पारदर्शी नहीं है। आवश्यक है कि न्यायपालिका को भी पारदर्शी बनाया जाय।
*****
(साभार उद्धृत अंश: समाचार-विचार पाक्षिक "प्रथम प्रवक्ता", नोएडा, उप्र, अंक- 1-15 फरवरी 2013, आलेख- 'पुलिस और न्यायपालिका में सुधार की जरुरत', लेखक- प्रशान्त भूषण)

घिर गयाहै देश! (भाग- 2)

कब जागेगा हमारा ‘राष्ट्रीय संकल्प’? 

गतांक से जारी..

ली क्वान यू के बारे में कहते हैं कि जब वह कुछ कहते हैं, तो दुनिया के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजनयिक और सीइओ सुनते हैं. पिछले 50 वर्षों से वह दुनिया के रंगमंच पर हैं. इस पुस्तक में कई अध्याय हैं. पर, इसकी शुरुआत ही ‘द फ्यूचर ऑफ चायना’ (चीन का भविष्य) से है. इस पुस्तक में एक छोटा अध्याय ‘द फ्यूचर ऑफ इंडिया’ (भारत का भविष्य) भी है. हालांकि, भारत से जुडे. अध्याय का उल्लेख कवर पर नहीं है. कारण और संकेत साफ है कि भारत की अहमियत चीन के बराबर नहीं है. 


इस अध्याय में ली से चीन के भविष्य पर पूछे गये सवाल हैं कि चीन कैसे दुनिया में नंबर एक बन रहा है? अपने पड़ोसी देशों के साथ उसका बरताव कैसा रहेगा? अमेरिका से उसके संबंध कैसे होंगे? वगैरह-वगैरह. बहुत कम शब्दों में चीन की प्रगति पर ली की टिप्पणी दृष्टिसंपत्र है. वह कहते हैं कि चीनी लोगों ने एक गरीब चीनी समाज को आर्थिक चमत्कार से बदल दिया है. आज दुनिया की वह दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. गोल्डमैन सैक्स की भविष्यवाणी है कि अगले 20 वर्षों में चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थावाला देश होगा. चीन ने अमेरिका की तरह अंतरिक्ष में अपने लोग भेजे हैं. चीन के पास चार हजार वर्ष पुरानी सभ्यता है. 130 करोड. की आबादी है. प्रतिभाशाली लोग हैं. इसलिए चीन के मानस में एशिया में नंबर एक और फिर दुनिया में नंबर एक बन जाने की आकांक्षा स्वाभाविक है. आज चीन दुनिया में सबसे तेज विकास करनेवाला देश है. उसकी विकास दर स्तब्ध करनेवाली है. हैरत में डालनेवाली है. चीनी लोगों ने बडे. सपने देखे हैं. बड़ी आकांक्षाएं पाली हैं. आज हर चीनी एक मजबूत और संपत्र चीन चाहता है. समृद्ध देश चाहता है. विकसित और अग्रणी मुल्क चाहता है. तकनीकी रूप से सक्षम अमेरिका, यूरोप और जापान के मुकाबले. चीनी अवाम ने अपनी नयी नियति लिखने में अपनी ऊर्जा लगा ली है. पूरा मुल्क एक सपने से संचालित है.



इसके बरक्स आज भारत की तसवीर का आकलन करिए. आज कहां है, मुकम्मल भारत का सपना? क्षेत्रीय दलों और छत्रपों की मंडियों और गलियों में खो गया है. कहां है, मुल्क के प्रति उत्कट भावना और देश-प्रेम? ली, चीन का अतीत और स्वभाव बताते हैं. चीनियों को साम्राज्यवाद की कॉलोनी (उपनिवेश) बनने के पहले की दुनिया याद है. उनके मानस में उसके बाद के शोषण और अपमान याद हैं. अपने इस अपमान की धुंध में चीनी नेतृत्व ने कई दशकों पहले चीन को महाशक्ति बनाने का सपना देखा. आज वह सपना फलीभूत हो रहा है. चीन में, चीन का अर्थ है, मध्यकाल का साम्राज्य यानी वह संसार, जब चीनियों का लगभग पूरे एशिया में बोलबाला था. अन्य देश उनके मातहत थे. चीन के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते थे. नजराना देते थे. ब्रुनेई के सुल्तान का एक मकबरा बीजिंग में है. वह जहाजों का बेड़ा लेकर, उन पर श्रेष्ठ सिल्क (रेशम) लाद कर चीनी शासकों को नजराना पेश करने बीजिंग आये थे. भेंट देने के समय ही वह मर गये. 400 वर्ष पहले चीन में उनकी समाधि बनी. ली कहते हैं कि क्या एक औद्योगीकृत और मजबूत चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के प्रति उसी तरह उदार, दयालु, भद्र या सौम्य रहेगा, जैसे अमेरिका 1945 के बाद रहा है? ली का निष्कर्ष है कि चीन के ऐसे बरताव के प्रति सिंगापुर आश्‍वस्त नहीं है. इसी तरह इंडोनेशिया, मलयेशिया, फिलीपींस और वियतनाम.. वगैरह देश, चीन को आज आत्ममुग्ध और कठोर कदम उठाने का मानस रखनेवाले मुल्क के रूप में देख रहे हैं. एशिया के अनेक छोटे देश चिंतित हैं कि चीन फिर अपने उसी साम्राज्यवादी (इंपीरियल स्टेट) दौर में लौटना चाहेगा, जो चीन के इतिहास या मध्यकाल का दौर है. ऐसी शंका है कि वह अन्य राज्यों के साथ जागीर, मातहत, अधीन या दास राज्यों के रूप में व्यवहार करेगा, उसी तरह जब अतीत की शताब्दियों में चीन के पड़ोसी देशों को उसे नजराना देना पड.ता था. आज चीन के पास अत्यंत कुशल और शिक्षित मानव संपदा है. चीनी टीवी में एक सीरियल ‘द राइज ऑफ ग्रेट पावर्स’ पार्टी के द्वारा तैयार किया गया. पूरे मुल्क में दिखाया गया. चीन लगातार सिलसिलेवार उसका अनुकरण कर रहा है. यह सीरियल चीन के बौद्धिक वर्ग के विर्मश से तैयार किया गया है. अब एक क्षण आप इस संदर्भ में भारत के बारे में सोचिए. आज भारत के पास क्या अतीत-बोध है? भविष्य का सपना और नक्शा है? भारत के किसी राजनीतिक दल के पास एक पुख्ता भारत का सपना है? पर चीन दशकों से इसी सपने के इर्द-गिर्द अपने देश का मानस बनाता रहा है. चीन आज अपने युवकों को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा देने की होड. में है. वह अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को विज्ञान और तकनीक में उतार रहा है. इसके बाद के बच्चों को अर्थशास्त्र, बिजनेस मैनेजमेंट और अंगरेजी भाषा में दक्ष बना रहा है. चीन के इस विकास मॉडल के थिंक टैंक (चिंतक समूह) के एक वरिष्ठ सदस्य ली से मिले. चीन के विकास के बारे में पूछा? ली का जवाब था, शांतिपूर्ण, पुनर्जागरण, पुनरुत्थान (इवोल्यूशन) या विकास? पर ली ने शंका साफ की. कहा कि आप (चीन) अपनी युवा पीढ़ी में अत्यधिक आत्मगौरव (प्राइड) और देशभक्ति (पेटट्रिज्म) भर रहे हैं. यह अत्यंत उग्र और अस्थिर है. अब आप भारत के लोगों के मानस की तुलना चीन के इस मानस से करिए. कहां ठहरते हैं, हम उनके मुकाबले? ली कहते हैं कि चीन, बिना सेना इस्तेमाल किये या ताकत दिखाये अनेक देशों को अपनी अर्थव्यवस्था में समाहित कर लेता है या खींच लेता है. सोख लेता है. चीन की रणनीति है, अपना प्रभाव बढ़ाना. अपनी ताकतवर अर्थव्यवस्था के बल. पीछे ताकतवर अर्थव्यवस्था और उसी के बल विदेश नीति की डिप्लोमेसी. हर बात के पीछे अर्थ-संपदा और सबसे ताकतवर सैन्य बल का छिपा संदेश. ब्रिटेन के साम्राज्यवाद के दौर को याद करें या अमेरिका के उफान-उत्कर्ष के दिन. सीधा फॉर्मूला है, मजबूत अर्थव्यवस्था, अत्यंत सक्षम मानव संपदा, सर्वश्रेष्ठ इंफ्रास्ट्रक्चर, अत्यंत मजबूत सेना और फिर दुनिया को नचाने की ताकत बगैर कहे पाना. इसी फॉर्मूला के तहत आज चीन अपने उत्कर्ष के शीर्ष पर जगह बना रहा है. भारत ने पिछले 30-40 वर्षों में अपने पुनर्निर्माण का वह सपना, संकल्प, आत्मविश्‍वास और जज्बा ही खो दिया है. चीन, दुनिया को काबू करने की ताकत हासिल कर चुका है. हम, भारतीय देश में हो रहे रेप, स्कैंडल, लूट, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, चोरी, आपसी वैर, जाति, धर्म और क्षेत्र के झगड़ों में डूबे हैं.



बचपन की धुंधली स्मृति है. चीन आक्रमण के बाद की स्थिति. अपढ. महिलाएं जेवर उतार कर राष्ट्रीय कोष में दे रही थीं. देश के स्वाभिमान-सम्मान की रक्षा के लिए. एक अकेली अवाज की अनुगूंज बचपन में सुनी, वह भी गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की एक कविता की एक पंक्ति ‘चलो भाई बोमडिला’. गांव, कस्बे में गूंजती. तब न आज की तरह आवागमन के साधन थे, न प्रगति. पर भारत देश के लिए जज्बा था. बहुत बाद में चंद्रशेखर जी से जाना. वह 1962 में ही राज्यसभा गये थे. अकेले गुवाहाटी गये. टैक्सी लेकर तेजपुर. वहां के बाशिंदों का मनोबल बढ़ाने. यह जज्बा था, देश के प्रति. आज कहां खो गया ‘भारत’ का वह सपना, जिसके लिए हमारे पुरखे लडे.. बलिदान दिया. 



कुछेक वर्ष पूर्व शिलांग जाना हुआ. पता चला अरुणाचल में भारत-चीन सीमा पर प्राय: चीनी घुसपैठ की घटनाएं होती हैं. यह भी जानकारी मिली, सेना के बडे. स्रोतों से कि चीन ने अपनी सीमा में सड.क, संपर्क संसाधन वगैरह का अद्भुत विकास किया है. हम आज भी खारों से सामान ढोकर सीमा तक पहुंचाते हैं. अब यह मुकाबला एकतरफा है. चीन की बात तो छोड़ें, बाहरी पूंजी आज भारत में आने को तैयार नहीं. वह अधिक मात्रा में बांग्लादेश जा रही है. चीन से तो कोई मुकाबला ही नहीं है. वहां उसकी शर्तों पर बाहरी पूंजी की बाढ. है. इसके लिए सिर्फ भारत सरकार दोषी नहीं, हमारी पूरी राजनीति दोषी है. जो विदेशी निवेशक आते हैं, उनके पीछे हम सीबीआइ, आयकर वगैरह की जांच लगा देते हैं, घूस उन्हें अलग से देना पड.ता है. अब ऐसी स्थिति में कौन यहां आना चाहेगा? एक तरफ आपने उदारवादी अर्थनीतियां या बाजार व्यवस्था अपना ली है, दूसरी तरफ ‘लाइसेंस, कोटा, परमिट’ राज के मानस से काम कर रहे हैं. तो यह अंतर्विरोध होगा ही. या फिर स्वदेशी के रास्ते हम अपना विकास कर लें? दरअसल, हम कनफ्यूज्ड कौम हैं. बात आदर्श की करेंगे, पर हर पाप भी स्वीकार्य है. चीन ने दुनिया के ‘विचारों’ में नया इतिहास लिख दिया है. साम्यवादी देश ने अपने विकास का मॉडल बनाया, ‘मार्केट इकोनॉमी’ (बाजार अर्थव्यस्था) को. दो विचारों के संगम से निकली चीज से बना यह चीनी विकास मॉडल. इसके मूल में चीन के विकास की बात अहम थी. राष्ट्रीय गौरव या चीन को सुपरपावर बनाने का सपना सबसे अहम था. साम्यवाद या पूंजीवाद का सिद्धांत नहीं? यही देंग ने कहा भी था. पर भारत न गांधीवादी रहा, न नेहरूवादी, न समाजवादी, न पूरी तरह बाजार व्यवस्था को ही अपना सका. 



देश को गढ.नेवाली हमारी राजनीति आज कैसी है? बेअंत सिंह के हत्यारे को फांसी की सजा न मिले, यह प्रस्ताव पास होता है. इसी तरह राजीव गांधी के हत्यारे को सजा न मिले, यह सवाल उठता है. कोई राज्य, देश की विदेश नीति पर सवाल खड़ा करता है, क्या यही भारत है? और यह सब सिर्फ वोट और सत्ता के लिए हो रहा है. ली क्वान यू ने अपनी पुस्तक में भारत के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण बातें कही हैं. वह कहते हैं, भारत ‘महान’ न बन सकनेवाला देश है. इसकी क्षमता और संभावनाओं का इस्तेमाल भी नहीं हुआ है. इसकी क्षमता की धरती आज भी बंजर, परती और खाली है. वह कहते हैं, राज्यों में आपसी सीमाओं को लेकर, भाषाई प्रतिबद्धता को लेकर, जातिगत कोटे के सवाल पर झगडे. होते रहेंगे. भारतीय नौकरशाही सिर्फ अत्यंत सुस्त ही नहीं है, वह परिवर्तन विरोधी भी है. क्षेत्रीय धक्कमधक्का और भ्रष्टाचार, भारत की मदद नहीं कर रहे. भारत के पास र्जजर इंफ्रास्ट्रक्चर है. बिजनेस की दृष्टि से अत्यंत केंद्रीकृत और अवरोधक व्यवस्था है. बेकाबू राजकोषीय घाटा.. इन सबसे न नौकरियां बढ. रही हैं, न निवेश आ रहे हैं. न भारतीय अर्थव्यवस्था बढ. रही है. 



ली आगे कहते हैं कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि यहां, जो सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं हैं, वे शीर्ष पर नहीं पहुंचतीं. यह सामंती मिजाज का देश है, जहां आपका जन्म (यानी आप जिस जाति या धर्म में जन्मते हैं), आपका भविष्य तय करता है. भारत के अधिकतर इंजीनियरों और ग्रेजुएट छात्रों के पास ‘स्किल’ नहीं है. इस तरह भारत विकास के नक्शे में 40 वर्ष गंवा चुका है. अपनी रणनीति या अर्थनीति के कारण. ऐसी अनेक महत्वपूर्ण बातें ली ने कही हैं, भारत के संदर्भ में.



क्या चीन से बार-बार अपमानित होने के बाद भी हमारा ‘राष्ट्रीय संकल्प’ जगेगा? इन सवालों पर हमारी राजनीति, हमारे नेता व बौद्धिक विर्मश करेंगे?

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प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश जी के कलम से, 
साभार:
http://epaper.prabhatkhabar.com/epapermain.aspx?pppp=10&queryed=16&eddate=4/29/2013%2012:00:00%20AM 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

घिर गया है देश!

घिर गया है देश!

- बाजार, समुद्र, आकाश और धरती के मोरचों पर
।। हरिवंश ।।
भारत संकट में है. यह चीनी संकट है. भारत की सभी मौजूदा बाहरी-आंतरिक चुनौतियों के बीच सबसे बड़ी. चीन ने भारत पर चौतरफा प्रहार किया है. बाजार (मार्केट), समुद्र (वाटर), आकाश (स्पेस) और धरती के मोरचों पर. इन तथ्यों पर नजर डालें,
* आरंभिक खबर के अनुसार 15 अप्रैल, 2013 को तकरीबन 50 चीनी सैनिकों का एक प्लाटून लद्दाख की भारतीय सीमा में 10 किलोमीटर अंदर घुस कर टेंट गाड़ चुका है. साथ में कुत्ते भी हैं. हद तो तब हो गयी, जब भारत सरकार ने 27 अप्रैल को संसद को बताया कि चीनी सैनिक 10 किलोमीटर नहीं, 20 किलोमीटर अंदर (भारतीय सीमा) घुस आये हैं. पूर्वी लद्दाख के दौलतबेग ओल्डी (डीओबी) सेक्टर में. यह अपमान और हम (भारत) लगभग असहाय हैं. 23 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच वार्ता भी हुई. पर चीन पीछे नहीं हटा. लद्दाख क्षेत्र में चीन ने 1962 के बाद पहली बार तंबू गाड़े हैं. 2013 में चीन के प्रधानमंत्री कियांग के भारत दौरे से ठीक महीने पहले लद्दाख के दौलतबेग ओल्डी में चीनियों ने तंबू गाड़े हैं.
 * एक तो घुसपैठ ऊपर से चीन का यह आक्रामक रवैया. 21.04.13 को भारतीय सीमा में घुस कर चीन के हेलीकॉप्टरों ने खाने के केन, सिगरेट पैकेट और अपनी भाषा में लिखे कागजात गिराये. दरअसल, यह जगह अक्साई चीन की तरह महत्वपूर्ण है. रणनीतिक तौर पर अक्साई चीन को भी चीन ने हथिया रखा है. पिछले वर्ष सितंबर- 2012 में चीनी हेलीकॉप्टर चूमर के भारतीय सीमा में घुसे. उतरे. भारतीय सेना के पुराने बंकर और टेंट वहां थे. उन्हें नष्ट कर दिया.
* 23 अप्रैल, 2013 की दूसरी बड़ी खबर है. चीन की सेना ने भारतीय सीमा में स्थित पेगांग झील के हिस्से में भी घुसपैठ की (स्रोत : हेडलाइंस टुडे)
* चीनी जहाज 21 अप्रैल को पश्चिमी हिमालय के भारतीय इलाके में उड़ते देखे गये.
* जून, 2011 में उत्तराखंड के चूमर में चीन के हेलीकॉप्टरों ने भारतीय सीमा का उल्लंघन किया. हिमालय की ग्या पहाड़ियों में चीनी सैनिकों ने चीनी भाषा में (लाल रंगों में) नारे लिख कर अपने इरादे स्पष्ट किये.
* पिछले पांच साल में न सिर्फ लेह-लद्दाख, बल्कि उत्तर-पूर्व इलाके में भी चीन की घुसपैठ लगातार बढ़ी है.
* 1987 में अरुणाचल प्रदेश में भी तवांग के उत्तरी इलाके (सम दोरांग चू) पर चीन ने कब्जा कर लिया था. यह क्षेत्र अभी उसके कब्जे में ही है.
* इसके पहले भी चीन ने चुपचाप सीमा के अनेक क्षेत्रों में इसी तरह घुसपैठ की और उन्हें अपना बना लिया. मसलन, अक्साई चीन (1950), पारसेल आइसलैंड (1974), जानसन रीफ (1988), मिसचीफ रीफ (1995) और स्कारब्रो सोल (2012).
* भारतीय सेना के जम्मू-कश्मीर में तैनात लेफ्टिनेंट जनरल वीएस जसवाल (भारत के उत्तरी कमांड के प्रमुख) को चीन ने वर्ष 2010 में वीसा देने से मना कर दिया. तब चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत आ रहे थे. चीन ने तर्क दिया कि चूंकि जनरल वीएस जसवाल कश्मीर में तैनात हैं, यह पाकिस्तान से विवादित इलाका है. चीन को पाकिस्तान की भावनाओं का ध्यान है, इसलिए हम ऐसा कर रहे हैं.
* इसी तरह वर्ष 2012 में चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, भारत आनेवाले थे. उनकी यात्रा के ठीक पहले चीन ने अरुणाचल प्रदेश में तैनात भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन को वीसा देने से मना कर दिया.


* 2006 में चीनी राजदूत ने भारत में दावा किया था कि अरुणाचल प्रदेश की 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन, उसका इलाका है. इसे पहली बार चीन ने दक्षिण तिब्बत कहा.

* अब चीन मनमाने ढंग से कहता है कि 2,000 किलोमीटर क्षेत्र में भारत से सीमा विवाद है. यह एकतरफा बयान है. इसमें सिक्किम वगैरह के इलाके हैं.
* पश्चिमी क्षेत्र में चीन ने एक और कमाल किया. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन ने अपनी सेना तैनात की है. 2011 में थल सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने बार-बार कहा कि साढ़े तीन से चार हजार चीनी सैनिक इस इलाके में हैं. पर, भारतीय नेता वीके सिंह को ही हटाने में लगे रहे. हालांकि, वीके सिंह की यह बात सच थी. इस तरह चीन ने कश्मीर से लेकर अरुणाचल के बीच जगह-जगह भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर ली है. सीमावर्ती क्षेत्र पर अति मजबूत और चौड़ी सड़कें बना ली है. चीनी अधिकृत सीमा में कई जगह हवाई अड्डे बना लिये हैं.
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- अब समुद्री क्षेत्र पर एक नजर
* 01.02.13 को पाकिस्तान ने ग्वादर पोर्ट (बंदरगाह) को बनाने-विकसित करने का काम चीन को सौंपा. पाकिस्तान की मंशा के अनुसार चीन यहां नौसैनिक अड्डा भी बनायेगा. पाकिस्तान ने इस काम के लिए तय कुल 1331 करोड़ रुपये के 75 फीसदी का भुगतान भी कर दिया है.
* मालदीव के मराओं में चीन का अड्डा है. 1991 में मालदीव ने इसे चीन को लीज पर दे दिया था.
* श्रीलंका के हब्बन टोटा पोर्ट पर चीन मौजूद है. डीपवाटर पोर्ट बनाने के काम को लेकर. भारत को घेरने के हिसाब से यह बंदरगाह अत्यंत महत्वपूर्ण है. भारत के मालवाहक जहाज और नौसेना के जहाज इधर से गुजरते हैं.
* बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह में भी चीन है. उसने इसके लिए बांग्लादेश को भारी मदद दी है. चीनी नौसेना के लड़ाकू जहाज यहां आते हैं.
* म्यांमार (वर्मा) के सितवे बंदरगाह को, भारत की एक निजी कंपनी ने 650

करोड़ में विकसित किया, पर यहां चीन काबिज है.

* नेपाल में चीन आज भारत से अधिक महत्वपूर्ण और ताकतवर है. इस तरह समुद्री क्षेत्र में भारत को पूरी तरह से चीन घेर चुका है. हाल के ब्रिक्स देशों की बैठक (मार्च, 2013 अंत) में भारत के प्रधानमंत्री, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिले. उन्होंने कहा कि नदियों पर बना रहे अपने बांधों की नीति और पारदर्शी बनायें. पर भारत के इस अनुरोध को चीन ने मजाक बना दिया. चीन के 12 पड़ोसी देश हैं. चीन से इन देशों का नदी संबंध है. यानी नदियां एक-दूसरे देश में बहतीं हैं. भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ पानी बंटवारे की संधि की है. पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों के साथ. यह अंतरराष्ट्रीय जल नियमों के तहत है. चीन इस अंतरराष्ट्रीय जल कानून को ही खारिज करता है. उसने अपने किसी पड़ोसी के साथ जल बंटवारे की संधि या समझौता भी नहीं किया है.
अभी हाल में चीन ने तीन नदियों साल्विन, द मेकोंग और ब्रह्मपुत्र पर 11 अतिरिक्त बड़े बांध बनाने की घोषणा की है. किसी की परवाह के बगैर. चीन, ब्रह्मपुत्र पर कई बड़े बांध पहले ही बना चुका है. इसने सिंधु और सतलज पर भी बड़े बांध बनाये हैं. अब अरुण (कोशी) पर भी बांध बनाने की योजना बना चुका है. कोशी, बिहार से ही गंगा के प्रवाह को ताकत देती है. इस कोशी पर भी चीन बांध बना रहा है. अगर यह बांध बन गया, तो गंगा बिहार में तो सूखेगी ही, बांग्लादेश को भी पानी नहीं मिलेगा. यह भी याद रखिए कि वर्ष 2000 से 2005 के बीच हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में बाढ़ ने जो तबाही मचायी, वह चीन के कारण हुआ. भारी बरसात से चीन के बांध और बराज उफनने लगे, तो चीन ने उन्हें खोल दिया.
हद तो यह है कि पाकिस्तान को भारत ने जल बंटवारे संधि की सर्वश्रेष्ठ सौगात दी है. इसके बाद भी वह, भारत को अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में खींच कर ले गया है. भारत असहाय होकर खामोश है. उधर, चीन एकतरफा बड़े-बड़े बांध बना रहा है और भारत को उपदेश देता है कि वह पाकिस्तान को पानी नहीं दे रहा है. देहात की कहावत है कि जबरा मारे भी, रोने भी न दे.
- अंदरूनी मसलों में फंसा नेतृत्व
आज यह स्थापित सच है कि चीन, भारत से बहुत आगे निकल गया है. आज वह हवाई मार्ग और समुद्री मार्ग से 70 हजार चीनी सैनिकों को एक पहल पर एक जगह जुटा सकता है. पर, भारत सिर्फ समुद्री रास्ते महज तीन हजार सैनिकों को ही एक पहल में जुटा सकता है. यह इस तरह 70 हजार बनाम तीन हजार का मुकाबला हो गया है.

फरवरी में ही चीन ने अपने वाई-20 वायुयान का परीक्षण किया. चीन में ही निर्मित 66 टन भार ढोनेवाला. इस तरह चीन 30 हजार सैनिकों को हवाई बेड़े से ढो सकता है. इस तरह एशिया में आज चीन अकेले गेमचेंजर की भूमिका में है. चीन 12 बड़े जलपोत बना रहा है. 20 हजार टन से अधिक भार के, जो सेना के तीन डिवीजनों यानी 30 हजार सैनिकों को ढो सकते हैं. चीन ने भारतीय समुद्री इलाके में दो लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक्स लगाये हैं, जिनमें 10 हजार सैनिक, टैंक और लड़ाई के हेलीकॉप्टर रह सकते हैं.
इन सब के मुकाबले भारत के पास महज एक जहाज है. आइएनएस जलश्व. यह जहाज महज तीन हजार सैनिकों को ढो सकता है. यह भी अमेरिका से खरीदा गया है. चीन के पास आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है. भारत चौथे स्थान पर है. भारत की अर्थव्यवस्था चीन से काफी पीछे है. पर भारत की आबादी एक-डेढ़ दशकों में चीन से अधिक हो जायेगी. चीन ने पाकिस्तान समेत भारत के पड़ोसियों को साम, दाम, दंड, भेद से अपने पक्ष में कर लिया है.
अमेरिका के रक्षा मुख्यालय पेंटागन की रिपोर्ट में चीन को तेजी से बढ़ती सैनिक ताकत स्वीकार किया गया है. चीन का रक्षा बजट, भारत के रक्षा बजट से कई गुना अधिक है. अनुमान है कि आनेवाले कुछ वर्षों तक चीन अपने रक्षा बजट में हर साल 20 से 25 फीसदी तक बढ़ोतरी करेगा.
2009 में ही पेंटागन ने भारत को सतर्क किया था कि चीन, भारतीय सीमा के करीब अत्याधुनिक सीएसएस-5 मिसाइलें बड़ी संख्या में तैनात करने की तैयारी कर चुका है. यह भी कहा गया कि भारतीय सीमा पर अपनी वायुसेना को बहुत कम समय में वह सक्रिय कर सकता है. चीन की सत्ताधारी पार्टी की एक पत्रिका है, टकीसीज. हाल के दिनों में इसमें कुछ लेख छपे हैं. इसमें भारत के साथ सीमा विवाद को सलटाने और शांति स्थापित करने के लिए युद्ध की बात कही गयी है. पत्रिका का विचार है कि शांति सिर्फ युद्ध के रास्ते ही आ सकती है. रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन थंडर ड्रैगन-2014 ऑपरेशन की योजना पर काम कर रहा है. इसके तहत वह पाकिस्तान से मिल कर भारत पर दोतरफा हमला करेगा.
यहां मकसद चीन की ताकत का ब्योरा देना नहीं है. ऐसे अनेक तथ्य हैं, जो चीन के ताकतवर होने, आक्रामक होने और भारत के निरंतर अपमानित होने से जुड़े हैं. मूल सवाल यह है कि आज इस आक्रामक पड़ोसी व नयी महाशक्ति के मुकाबले भारत कहां खड़ा है? भारत को क्या यह एहसास भी है कि वह चीन के शिकंजे में है. लगता नहीं है. समाजवादी नेता राजनारायण जी अक्सर अपनी पार्टी के आक्रामक नेताओं को संकेत कर कहते थे कि लंगड़ी बिलार, घर में शिकार. हम घर में ही लड़नेवाले कमजोर लोग हैं.
हमारे पास देश के लिए कोई सपना नहीं है. जो भी राजनीतिक सपना है, वह महज गद्दी पाने तक सीमित है. गद्दी पाकर देश को महान या ताकतवर बनाने का अरमान नहीं है. यह तो कथित राष्ट्रीय दलों का हाल है. अब तो छत्रप बहादुरों का भी दौर है. हर सूबे में क्षेत्रीय दल उभर आये हैं. जिनका आचरण अपने राज्य को ही देश मानने जैसा है. हम वह आचरण और गंभीरता खो चुके हैं, जो किसी कौम या देश को महान बनाता है.
याद करिए, बमुश्किल साल भर पहले की घटना है. तत्कालीन भारतीय सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने प्रधानमंत्री को एक गोपनीय पत्र लिखा. उस पत्र में उन्होंने भारत की सेना के पास गोला-बारूद, हथियार न होने की स्थिति की चर्चा की. वह पत्र लीक हो गया. प्रधानमंत्री कार्यालय ने जांच करायी. आइबी से. खबर की पुष्टि हुई कि यह पत्र सेनाध्यक्ष के यहां से लीक नहीं हुआ है. पर ईमानदार सेनाध्यक्ष को बरखास्त करने की मांग संसद में गूंजने लगी.
सभी राजनीतिक दल बेचैन हो गये. पर, किसी ने भी (संसद या भारतीय राजनीतिक दल) इस बात पर चर्चा नहीं की कि भारत के पास लड़ने के लिए पर्याप्त हथियार क्यों नहीं है? इस स्थिति के लिए जवाबदेह कौन है? पूर्व सेनाध्यक्ष ने बार-बार सवाल उठाया कि आज भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है. तीन-चार दशक पहले ऐसी ही स्थिति में चीन भी था. आज चीन स्वनिर्मित हथियार पर निर्भर है. निर्यातक भी बन गया है.
भारत क्यों नहीं हथियार आयातक से हथियार उत्पादक देश बन गया? क्या भारत में हथियारों की दलाली करनेवाली लॉबी, भारत सरकार से भी ताकतवर है? क्यों भारतीय सेना, चीन के मुकाबले अत्याधुनिक हथियारों से लैस नहीं है? दरअसल, सवाल तो यह उठना चाहिए कि भारत क्यों कमजोर मुल्क रह गया और चीन ने कैसे दुनिया में नया इतिहास रच दिया? चीन की हाल की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिससे चीनी नेतृत्व के मानस को समझने में मदद मिलती है. पहले यह खबर चीन सरकार द्वारा संचालित शिन्हुआ न्यूज एजेंसी ने जारी की. फिर बाद में खंडन भी किया. यह चीन की पुरानी आदत है. पर, खबर पूरी दुनिया में फैल गयी.
खबर आयी कि 18 अप्रैल, 2013 को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक अज्ञात यात्री बन कर एक टैक्सी में चढ़े. टैक्सी ड्राइवर 46 वर्षीय गुओलिक्सिन थे. दोनों के बीच बात शुरू हुई. दोनों ने बीजिंग में छायी धुंध-कोहरा (पर्यावरण संकट से जुड़ी) की चर्चा की. राष्ट्रपति ने कहा कि पर्यावरण दूषित करना आसान है. पर, इसे ठीक करना मुश्किल है. एक मिनट लगता है, प्रदूषित करने में और 10 मिनट लगते हैं, इसे ठीक करने में. तब तक टैक्सी रेड लाइट चौराहे पर पहुंच गयी. ड्राइवर ने पलट कर कहा, आपको अब तक किसी ने बताया है कि नहीं कि आपका चेहरा या आप पार्टी सचिव शी जिनपिंग से मिलते हैं. मस्कुराते हुए शी जिनपिंग ने कहा कि आप पहले ड्राइवर हो, जिसने मुझे पहचाना. ड्राइवर बोला, आप आम लोगों से बहुत नजदीक हैं.
हम जनता के लिए यह वरदान है कि आप हमारे बीच हैं. इसके बाद राष्ट्रपति बीजिंग के डायोतायी होटल पहुंचे और 30 युआन का भुगतान किया. ड्राइवर ने कहा कि मैं उनकी आवाज सुन कर स्तब्ध था. तीन मिनट तक तो मेरे बदन और चेहरे पर पसीना बहता रहा. मैं ढंग से बोल नहीं पा रहा था. दरअसल, यह प्रयास चीन के सर्वसत्तावादी नेतृत्व का जनता के बीच जाने का नया अभियान है.
हमारी व्यवस्था में भी बहुत पहले चाणक्य कह गये कि राजा वेष बदल कर प्रजा के बीच जाये. व्यवस्था की खामी समझे. पर हमने लोकतंत्र को राजतंत्र बना लिया. अंतत: राजनीति ही जज्बा पैदा करती है. चाहे वह देश बनाने का सवाल हो या देश बचाने का सवाल? आज भारत की राजनीति, विचारहीन हो गयी है. सपनाविहीन है. चीन ने इस कदर भारत को घेर रखा है, पर भारत में कहीं इस पर बहस नहीं. बेचैनी नहीं.
डॉ लोहिया अकेले नेता था, जिन्होंने चीन के इस रूप को पहचाना. इस विषय पर काफी लिखा और कहा. इसके पहले 1950 में मृत्युशय्या पर पड़े सरदार पटेल ने पंडित नेहरू को पत्र लिख कर आगाह किया कि चीन, तिब्बत हड़पेगा. पंडित जी तब हिंदी-चीनी भाई-भाई के कल्पना लोक में डूबे थे. कई बार लगता है, पंडित जी महान थे, पर चीन के मामले में वह अपनी छवि को दुनिया में देश से ऊपर देखते थे, इसलिए उन्हें धोखा हुआ. लेकिन, उसके बाद से आज तक भारत की क्या विदेश नीति रही है? क्या हमने सीखा? हर पड़ोसी हमसे नाराज व अलग है.
चीन ने अचानक भारत में प्रवेश नहीं किया है. इसके पहले उसने मुल्क की आर्थिक स्थिति मजबूत की. देश को समृद्ध बनाया. सैनिक ताकत को समृद्ध किया. शोध, विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत काम किये. वह जानता है कि दुनिया ताकत के आगे झुकती है. इसलिए आज भारत के कमजोर पड़ोसी भी भारत को आंख दिखा रहे हैं और चीन के साथ हैं. भारत सिर्फ डिप्लोमेसी (राजनायिक) से चीनी सेना से निपटना चाहता है. यह संभव नहीं है.
चीन अब एक महाशक्ति है. वह अपना दंभ दिखा रहा है. सवाल यह है कि भारत में आज कहीं देश का कोई सपना जीवित है? चीन के पास एक सपना था. दुनिया की महाशक्ति बनने का. वह बना. 1978 में उसने नये सिरे से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने का संकल्प लिया. देंग सियाओ पेंग के नेतृत्व में. आज भारत के क्षेत्रीय दलों के पास क्या सपने हैं? महज अपने राज्य की गद्दी पाना और भ्रष्टाचार करना. भ्रष्टाचार में शामिल सभी दलों के नेता देश को अंदर से खोखला कर रहे हैं. भारत के ऐसे नेता, भारत के लिए चीन से भी बड़ी चुनौती हैं. चीन ने एक-एक कर सुनियोजित ढंग से अपना कायाकल्प किया. मसलन, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों को लें. क्योंकि अंतत: शिक्षण संस्थाएं ही किसी देश को इस नालेज एरा (ज्ञानयुग) में दुनिया में सबसे अधिक ताकतवर और मजबूत बनाती हैं.
दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सौ संस्थाओं में (संदर्भ- www.usnews.com/education/worlds-best-universities-rankings) में चीन की तीन संस्थाएं है. भारत की शून्य. ब्रिटेन की 18. अमेरिका की 31. जापान की पांच. सिंगापुर की दो. दक्षिण कोरिया से तीन. इसी तरह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 200 संस्थाओं में चीन से सात संस्थाएं हैं. भारत से शून्य, जापान की नौ, सिंगापुर की दो. दक्षिण कोरिया से छह, ब्रिटेन से 30 और अमेरिका से 54. विश्व की साढ़े तीन सौ सर्वश्रेष्ठ संस्थाओं में चीन से 18 संस्थाएं हैं. भारत की पांच (पांचों आइआइटी), जापान की 14, दक्षिण कोरिया की नौ, ब्रिटेन की 41, अमेरिका की 76. यानी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ साढ़े तीन सौ संस्थाओं में चीन की 18 संस्थाएं हैं और भारत के सिर्फ पांच (इनका रैंकिंग भी 200 से 349 के बीच है और चीन की संस्थाओं की रैंकिग 44 से 168 के बीच).
सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटी व शोध केंद्र चीन में काम कर रहे हैं. भारत को किसने रोका है कि वह अपने शिक्षा क्षेत्र का कायाकल्प न करे? सपनाविहीन नेताओं ने, उद्देश्यविहीन सरकारों ने, स्वार्थी और नितांत निरक्षर राजनीति ने या अप्रभावी विपक्ष ने? आज देश बनाने का सपना खत्म है. पैसा बनाने, भोग करने और इंद्रिय सुख पाने का सपना देश के शासकों में सबसे प्रबल है.

टाइम्स हायर एजुकेशन मैगजीन ने एक सर्वे किया. 2013 में. दुनिया की 100 विश्व प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी की सूची बनायी. इस सूची में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को पहला स्थान मिला. ब्राजील, रूस और चीन भी इस सूची में हैं, पर भारत की एक भी संस्था नहीं है. आज भी अगर अमेरिका या यूरोप का दुनिया में वर्चस्व है, तो उनकी शिक्षण संस्थाओं के कारण. इस 100 की सूची में अमेरिका के 43 विश्वविद्यालय हैं. टॉप 10 में अमेरिका की सात संस्थाएं हैं, ब्रिटेन से दो और जापान की एक है.
यही हाल शोध पत्रों के क्षेत्र में है. मशहूर अखबार गाजिर्यन में इसी माह (अप्रैल-13) एक खबर छपी. चायना पोयाज्ड टू ओवरहाल यूएस एज बीगेस्ट पब्लिसर्स ऑफ साइंटिफिक पेपर्स यानी चीन वैज्ञानिक शोध पत्रों के प्रकाशक देश के रूप में अमेरिका को मात देगा या पीछे छोड़ेगा. यह रिपोर्ट आधारित है, दुनिया की मशहूर रॉयल सोसाइटी के अध्ययन पर. चीन ने ब्रिटेन को वैज्ञानिक शोध पत्रों के लेखन में पीछे छोड़ दिया है.
आज ब्रिटेन तीसरे स्थान पर है. रॉयल सोसाइटी की इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2013 तक चीन दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक शोध पत्रों का प्रकाशक देश बन सकता है. अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए. रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि दुनिया के परंपरागत सुपरपावर यानी महाशक्ति देशों को अब उभरते देशों की वैज्ञानिक शोध संस्थाओं से गंभीर चुनौती मिल रही है. ईरान, ट्यूनिशिया और तुर्की भी आगे निकल रहे हैं. द रॉयल सोसाइटी की इस रिपोर्ट के अनुसार, अंगरेजी में दुनिया के वैज्ञानिक शोध पत्र तैयार करने में अब चीन दूसरे नंबर पर है. जर्मनी, जापान, फ्रांस और कनाडा काफी पीछे छूट गये हैं.
आपने (हम भारतीय नागरिक) पिछले 30-40 वर्षो में संसद में, सरकार से, विपक्ष से या किसी राजनीतिक फोरम से या बौद्धिकों की बहस में इन बुनियादी सवालों पर चिंता या चर्चा सुनी है? क्यों हमारे शिक्षण संस्थान लगातार अराजक होते गये. शिक्षकों को महज वेतन बढ़ने की चिंता रही. सरकार को वोट बैंक बनाने की. पर सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को तराश कर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संस्था बना लें, यह सपना ही इस मुल्क में मर गया है.
जहां हजारों साल पहले नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे संस्थान होते थे. उसी मुल्क में आज हम वैज्ञानिक शोध पत्रों के लेखने में अपनी पहचान नहीं बना सके हैं. जो अंगरेज दे गये थे, उन संस्थाओं को भी हमने मारने-खत्म करने का काम किया. एक सत्येंद्र बोस, एक सी चंद्रशेखर, एक सीवी रमण हम 60 वर्षो में नहीं पैदा कर सके? दरअसल, हम जीतेजी मरे हुए कौम में तब्दील होते गये हैं. चीन द्वारा भारतीय सीमा में अतिक्रमण से भी कहीं हमारा स्वाभिमान जगता या संकल्प पैदा होता, वह स्थिति भी नहीं है.
स्पष्ट है कि जो तकनीक में आगे रहता है, वही दुनिया पर राज करता है. पहले ब्रिटेन था, इसलिए उसके राज में सूर्यास्त नहीं होता था. बाद में उसकी जगह अमेरिका ने ली. लगभग आधी सदी तक अमेरिका का वर्चस्व रहा. अब चीन उस वर्चस्व को चुनौती दे रहा है.
साफ है, दुनिया जिस चुनौती से जूझ रही है, उससे जुड़े अगर नये शोध होते हैं और उसका अगुआ चीन होता है, तो दुनिया में चीन का ही वर्चस्व होगा. भारत इस मामले में बहुत पीछे है. चीन ने चूंकि सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान बनाने का अभियान चला रखा है, कई दशकों से, इसलिए वह विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग वगैरह में नये शोध और नयी तकनीक का अगुआ बन रहा है. चीन नैनो टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग के महत्वपूर्ण शोधों में लगा है. रॉयल सोसाइटी अध्ययन के प्रोफेसर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ऊर्जा शोध निदेशक प्रो क्रिस लेलविन स्मिथ ने कहा कि चीन ने नैनो टेक्नोलॉजी में अपार पूंजी लगा दी है.
दुनिया की सर्वश्रेष्ठ लैबोरेटरीज (प्रयोगशालाएं) बनायी हैं. दुनिया के कोने-कोने से सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं वह इकट्ठा कर रहा है. इसका अर्थ और परिणाम साफ है. दुनिया के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों की दृष्टि में चीन, नैनो टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग में दुनिया की रहनुमाई करेगा. इसलिए दुनिया का भविष्य वह बनायेगा. प्रभावित करेगा. नये खोज, आविष्कारों में. ब्राजील में खेती और कृषि आविष्कारों पर उल्लेखनीय काम हो रहे हैं.
अंतत: भारत इन क्षेत्रों में कहां है? यह सवाल क्या भारत की राजनीति या संसद या शिक्षा क्षेत्र में कहीं है? भारत की राजनीति के अहम मुद्दों में आज कल ऐसे सवाल उठते हैं? फिर भी हम भारतीय ख्वाब में जी रहे हैं. भारत को हम दुनिया की उभरती महाशक्ति मानते हैं. चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर के सामने भारत कहीं ठहरता ही नहीं. अपनी ही अंदरूनी चुनौतियों से जूझता भारत.
क्या हम महज जनसंख्या या आबादी बढ़ानेवाला देश होकर रह गये हैं या अपनी नियति को लिखने के लिए भी हम तैयार हैं? जाति, धर्म, सत्ता, अगंभीरता ये सब हमारे राष्ट्रीय चरित्र के चिह्न् हैं. कुछ बड़े शहरों में गगनचुंबी इमारतें, पांच सितारा होटल और आलीशान बंगलों में देश की सत्ता सिमट गयी है. सरकारी योजनाओं की दलाली में अरबों-खरबों के सौदे हो रहे हैं. नौकरशाही में अकाउंटीबिलीटी नहीं है. चीन ने पिछले 40-50 वर्षो में अपने राजनीति नेतृत्व का कायाकल्प किया है. दुनिया के विश्वविख्यात संस्थाओं में पढ़े-लिखे दक्ष लोग सरकार चलाते हैं.
म्यूनिशिपल कॉरपोरेशनों का नेतृत्व, हार्वर्ड या अन्य संस्थाओं से पढ़-लिख कर आये लोग काम कर रहे हैं. हमारे यहां राजनीति में किस तरह की क्वालिटी है? जो समाज के तलछट हैं, कुछ नहीं कर सके, तिकड़म, षड्यंत्र, रंगदारी और अपराध में माहिर हैं, वे हमारा भविष्य तय कर रहे हैं. यह सही है कि भारतीय नेतृत्व में भी अनेक प्रतिभाशाली लोग हैं, पर उन्हें प्रतिगामी ताकतें या वोट बैंक खुल कर काम नहीं करने देती. यह है, चीन और भारत के नेतृत्व का फर्क. चीन में प्रतिभाशाली लोगों को पार्टी में प्रवेश मिलता है. उन्हें प्रशिक्षित कर ऊपर तक पहुंचाया जाता है. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में पर्दे के पीछे कुछेक लोग हैं, जो पूरी सत्ता पर निगाह रखते हैं.
दरअसल चीन के असल शासक परदे के पीछे हैं. वे अनसंग हीरोज (अंजाने नायक) हैं. ऐसे लोग चुपचाप चीन बनाने का सपना लिये, कठोर कर्म करते, दुनिया से गुमनाम चले जाते हैं. वे चीन की राजनीति में एक -एक व्यक्ति के कामकाज, चरित्र और विजन पर नजर रखते हैं.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय में गुमनाम बना यह शीर्ष नेतृत्व पार्टी के एक-एक काडर के काम, चरित्र और भूमिका को तराशता है. उसे भटकाव से रोकता है. फिर इनमें से छांट कर उन्हें प्रमोट कर, उनके हुनर को तराश कर शीर्ष पर पहुंचाता है. हर स्तर पर पार्टी ऐसे ही काम करती है. भारत में आज राजनीति में गये, दूसरे ही पल एमपी-एमएलए बने, फिर मंत्री वगैरह. बिना अनुभव, योग्यता या लियाकत हासिल किये हुए भारतीय नेता शीर्ष तक पहुंचते हैं. चीन में ठीक इसके उलट है. योग्य, अनुभवी, परखे हुए, दृष्टि संपन्न लोगों को आगे पहुंचाने का काम होता है. चीन की इस प्रक्रिया में भी गड़बड़ नेता मिलते हैं, पर इन पर तत्काल कार्रवाई होती है. लोग भूल गये हैं, भारत में भी आजादी के बाद नेताओं को तराशने-गढ़ने का ऐसा ही काम शुरू हुआ था.
पंडित नेहरू की पहली कैबिनेट में अनेक लोगों ने शामिल होने से मना कर दिया था. कहा, वे बाहर रहकर पार्टी बनाने, समाजसेवा करने जैसा काम करेंगे. एक से एक योग्य, त्यागी कद्दावर और चरित्रवान थे. ऐसे लोग सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं. कम्युनिस्टों में, समाजवादियों में, आरएसएस में, जो गुमनाम रह कर अपने दल के सिद्धांत, आदर्श और मूल्यों के लिए लोगों को तैयार करते रहे. आज भारत में यह प्रक्रिया ही बंद है.
भारत बनानेवाले बड़े नेताओं ने सपना देखा था कि लोकतंत्र में यह काम राजनीतिक दल करेंगे. दलों के अंदर लोकतंत्र होगा और प्रतिभाशाली लोग, चरित्रवान लोग उभर कर सामने आयेंगे. पर आज दल तो उन नेताओं की पॉकेट के खिलौने हैं, जिनके पास दौलत, सामर्थ्य और संसाधन हैं या जो सत्ता में हैं, वे सत्ता में रहने के कारण ही अपनी जागीरदारी चलाने की स्थिति में हैं. कहां है, देशभक्ति? या विचारों की ताकत या देश के लिए वह सपना, जो पंडित नेहरू ने आजादी के तत्काल बाद आधी रात को देश को संबोधित करते हुए दिखाया और कहा, हम नियति से मुठभेड़ के पल में हैं. आज कितनी दयनीय स्थिति है, भारत की.
26.04.13 को भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का बयान आया कि वह बातचीत के लिए चीन जायेंगे. पता नहीं उन्हें किसने न्योता है? चीन के विदेश या रक्षा मंत्री तो साफ कह रहे हैं कि चीन ने कोई घुसपैठ ही नहीं की है. लगता है कि चीन को लेकर भारत के पास कोई मुकम्मल रणनीति ही नहीं है. दो दिन पहले दक्षिण भारत में भारत के रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बयान दिया कि चीन से बातचीत चल रही है. हल निकल जायेगा. ठीक दो दिन बाद भारत के थल सेनाध्यक्ष का बयान आया कि दोनों देशों की सेना के बीच जो बात चल रही थी, अब उससे हल नहीं निकलनेवाला.
संकेत साफ है कि यह घुसपैठ चीन के शीर्ष नेतृत्व की सहमति से है. कुछ ही दिनों पहले टाइम्स आफ इंडिया की लीड खबर थी कि भारत-चीन की4057 किलोमीटर सीमा पर 600 बार चीन ने घुसपैठ की है. यह तीन वर्षों में हुआ है. फिर भी यह सवाल देश में मुद्दा नहीं है. हम किस चरित्र के लोग हैं? जरूरत है कि खुद आत्ममंथन करें. प्रधानमंत्री को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह के लिखे पत्र से भूचाल खड़ा हो गया था. पर, उस पत्र में जो बातें थीं, किसी भी समझदार मुल्क या संवेदनशील सरकार या व्यवस्था को बेचैन तो उन तथ्यों पर होना चाहिए. उस पत्र में कहा गया कि सेना खराब हालत में है. उसकी ट्रकें बुरी स्थिति में हैं. तोपखाना पुराना पड़ चुका है. अपर्याप्त है. हवाई सुरक्षा (एयर डिफेंस) पुरावशेष की स्मृति भर है. मिग विमान जहां देखिए, वे उड़ते हैं और दुर्घटनाग्रस्त होते हैं. हमारे सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू पायलट ऐसे ही मारे जा रहे हैं. शस्त्रगार या हथियार घर भरोसेमंद नहीं हैं. रात में लड़नेवाले हथियार अपर्याप्त हैं. भरोसेमंद नहीं हैं. हेलीकॉप्टरों को तत्काल बदलने की जरूरत है. तीन से पांच दिन युद्ध के लिए भी हथियार भंडार में नहीं हैं.
जनरल वीके सिंह ने अति ऊंचाई और ठंडी जगहों पर लड़ने के लिए मामूली जरूरी हथियारों के बारे में भी सवाल उठाये. इस पत्र के एक वर्ष बाद भी आज हालात लगभग वही हैं. क्या देश इन में इन चीजों पर बात नहीं होनी चाहिए? पर बात हुई जनरल वीके सिंह को हटाओ. धन्य हैं, हम?
एक मामूली आदमी भी जानता है कि आज भारत, चीन से युद्ध करने की स्थिति में नहीं है. युद्ध अंतिम हथियार है. आज युद्ध, दुनिया को तबाह कर सकता है. इसलिए इस लेख का आशय, दूर-दूर तक युद्ध की वकालत नहीं है. महज हम यह कहना चाहते हैं कि हर अपमान में संकल्प की आहट भी है. चीन द्वारा बार-बार भारत के इस अपमान से हमारा पौरुष, कर्म, देशप्रेम और संकल्प जगे. हम एक महान राष्ट्र बनें. हम यह चर्चा शुरू करना चाहते हैं कि हम कैसे इस मुकाम पर पहुंचे और कैसे अब भविष्य में हम अपनी तकदीर बदल सकते हैं? राष्ट्रीय चर्चा के लिए यही उपयुक्त घड़ी है. तत्काल कदम तो हो सकते हैं कि भारत, पूर्वी एशिया की अपनी रणनीति पर नजर डाले. तिब्बत का प्रसंग फिर उठे. आज दक्षिण-पूर्व और एशिया के कई देश हैं, जो चीन से तबाह और परेशान हैं.
वियतनाम, जापान, दक्षिण कोरिया आदि. क्यों नहीं भारत इन देशों के साथ मिल कर एक समूह बनाता? साथ ही भारत को अमेरिका के साथ मिल कर इस इलाके में सामरिक सुरक्षा की नीति पर काम करना चाहिए. हिंद महासागर में भारत अपनी ताकत मजबूत करे. भारतीय बाजार में चीनी समानों के विकल्प में भारत अपने औद्योगिक उत्पादन से कम से कम देश के बाजार को पाटे. हमारे उद्यमी, चीन से कतई कमजोर और पीछे नहीं हैं.
हम अपनी प्रतिभाओं का अपने ‘रेडटेप’ (पुराने कानून) से गला घोटते हैं. ये और ऐसे अनेक तात्कालिक उपाय हैं, चीन के इस रूख से निपटने के लिए. पर असल उपाय तो दीर्घकालीक हैं. इस चर्चा के प्रसंग में हाल में प्रकाशित एक अतिमहत्वपूर्ण पुस्तक का उल्लेख करना चाहेंगे. हर भारतीय को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए. पुस्तक का नाम है, ली क्वान यू. द ग्रैंड मास्टर्स इनसाइट ऑन चायना. द यूएस स्टेट एंड द वर्ल्‍ड. इंटरव्यू एंड सेलेक्शन वाइ - ग्राहम एलिशन एंड राबर्ट डी ब्लैकविल विथ अली वायन. फारवर्ड बाई हेनरी ए किसिंगर.
बताने की जरूरत नहीं है कि दुनिया में आज जो सबसे दृष्टिसंपन्न राजनेता माने जाते हैं, उनमें सिंगापुर के ली क्वान यू सबसे अग्रणी हैं. इनके बारे में चाहे चीन के राष्ट्रपति हों या अमेरिका के राष्ट्रपति, मानते हैं कि उनके पास सबसे आधुनिक और उपयोगी रणनीतिक सोच है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश ने तो कहा कि अपने सार्वजनिक जीवन की लंबी अवधि में मैं अनेक अत्यंत प्रतिभाशाली और सक्षम लोगों से मिला, पर ली क्वान यू जैसा कोई नहीं. ली ने दो खंडों में अपनी आत्मकथा भी लिखी है. उसमें भी भारत पर लंबी चर्चा है.
हर वह आदमी, जो इस देश को महान और ताकतवर देखना चाहता है, उसे ली की आत्मकथा भी अवश्य पढ़नी चाहिए. पर इस पुस्तक, ली क्वान यू में ली ने चीन के बारे में, अमेरिका के बारे में और दुनिया के भविष्य के बारे में दिये अनेक साक्षात्कारों में जो कुछ कहा है, उसे तीन अत्यंत महत्वपूर्ण विद्वान प्रोफेसरों (हार्वर्ड केनेडी स्कूल के ग्राहम एलिसन, काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशन के रॉबर्ट डी ब्लैक और वेलफेर सेंटर के प्रोफेसर अली वायन) ने संकलित किया है.
(जारी)

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